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शनिवार, 29 मई 2010

जिन खोजा तिन पाइयाँ ..............
'भारत मेरा देश है और हम सब भारत-वासी भाई-बहन हैं------' स्कूल में की गयी यह प्रतिज्ञा संस्कारों में इस क़दर धंस गई है कि अभी-अभी तक यह बोध भी नहीं होता था कि मैं कोई अन्य हूँ और कहीं और रहती हूँ । मैं जो भी हूँ और जो भी मेरा मूल प्रदेश है, इससे मुझे कभी कोई फ़रक नहीं पड़ा था; क्योंकि पहले राजस्थान और बाद में इतने वर्षों से गुजरात में रहते हुए मुझे कभी यह नहीं लगा कि मैं अपनी भूमि पर नहीं रहती। अब भी नहीं लगता। पर अब इधर कुछ और-और-सा लगने लगा है। यानी पहले मुझे इस बात के प्रति कोई रुचि नहीं थी कि मैं महाराष्ट्र प्रदेश , मराठी-भाषा, मराठी साहित्य आदि के बारे में जानूं। बल्कि अगर कोई मराठी-मराठी करने लगता तो मुझे बड़ी कोफ़्त होती। अपनी मराठी अस्मिता , पहचान को मैं बहुत प्रकट नहीं करना चाहती थी। बल्कि मझमें मराठी अस्मिता जैसा कुछ था भी नहीं। मुझे हमेशा ऐसा लगता था कि ऐसा करना संकीर्णता है, क्योंकि हम तो भारत वासी हैं। फिर जिस प्रांत में रह रहे हैं, उससे भी मेरा ऐसा लगाव नहीं था कि उस - मय हो जाऊँ। यानी एक तरह से मैं इस मामले में सेक्यूलर थी !
पर इधर देखती हूँ, पूरे देश का भावात्मक नक्शा बदल रहा है। लोग अपनी अस्मिता को ले कर इतने सजग हो गये हैं कि समाज मे रह रहे परिधि पर के ही नहीं, जो केन्द्र में हैं (अथवा अब तक थे) वे भी अपनी अस्मिता को ले कर झंडे उठाने लगे हैं। ख़ैर। मैं अब तक तो अपने आप को संयोग से मराठी और संयोगवशात् गुजरात का समझती रही हूँ। फिर मैंने विवाह भी एक गुजराती परिवार में किया, जो संयोग से ब्राह्मण है। इसी तरह जीवन का क्रम चल रहा था और है भी।
जब वर्षों पहले असम में आंदोलन हुआ और ग़ैर असमियों के लिये असम में रहना मुश्किल हो गया, तब मैं इतनी समझदार(!) नहीं थी और सोचती थी कि यह राष्ट्र के प्रति द्रोह करने जैसा है। अब जब अपने जीवन के पचास से कुछ अधिक साल पूरे कर चुकी हूँ और ऐसा मानती हूँ कि कुछ अकल में बढ़ोतरी हुई है तो पाती हूँ कि यह बढ़ोतरी आदर्श से यथार्थ और उदारता से संकीर्णता की ओर जाने वाली है। क्या सचमुच अब समय और परिस्थितियां बदली हैं या मुझे अब वह दिखायी देने लगी हैं !

मुझे पहला धक्का तब लगा जब एक बार हमारे भूतपूर्व कुलपतिजी ने बिना किसी भूमिका के मुझसे कहा कि मैं आपको हिन्दी से जुड़ी किसी समिति में नहीं रख सकता क्योंकि यह आदेश है कि हिन्दी भाषियों को न रखा जाये। मैंने तुरंत हँस कर कहा- 'सर, फिर तो मैं फ़्रेम के बाहर हूँ, क्योंकि न तो मैं हिन्दी भाषी हूँ और न ही गुजराती। मैं मराठी भाषी हूँ।' लेकिन तब पहली बार मुझे लगा कि मुझे कम-से-कम उस भाषा, उस प्रजा उसकी संस्कृति, साहित्य के बारे में जानना चाहिये, जिसकी बदौलत लोग मुझे पहचानते हैं, या मैं पहचानी जाती हूँ। जब भी यह प्रयत्न किया तो अचानक बैकग्राऊंड में बिगुल की आवाज़ और छत्रपति शिवाजी महाराज की जय सुनाई पड़ती। मुझे शिवाजी पर गर्व होना ही चाहिये और है भी और जानती हूँ कि यह कहना भी चाहिये क्योंकि अभी मुझे अपने बेटे को बड़ा भी करना है। पर एक सवाल मेरे मन में हमेशा उठता था कि क्या शिवराया के पहले महाराष्ट्र में कुछ नहीं था। कोई नहीं था। इधर मुंबई में आमचा महाराष्ट्र की जो हिंसक लहर उठी है उसके फलस्वरूप मेरी यह जिज्ञासा तीव्र हुई। मेरा बचपन का आदर्शवाद, भारत को एक राष्ट्र मानने की भावना, बुढ़ापे तक आते आते बीते जन्म की कहानी न हो जाये , ऐसा डर मुझे कई बार लगता है। ख़ैर।
लेकिन इतिहास के पास सभी बातों का उत्तर होता है। एक बार भारतेन्दु ग्रंथावली में मैंने भारतेन्दुजी के द्वारा लिखा मराठों का इतिहास पढ़ा। पर उससे मेरी मूल जिज्ञासा शांत नहीं हुई। पर मुझे अच्छा भी लगा कि एक हिन्दी भाषा के लेखक को यह आवश्यकता महसूस हुई कि वो मराठों का इतिहास लिखे। ऐसा नहीं कि उन्होंने मराठों के बारे में बहुत अच्छा लिखा हो , पर लिखा, यह महत्वपूर्ण है ।
मुझे याद है एक बार , बल्कि कई बार , हम दोनों बहनें मराठियों की जाति व्यवस्था आदि के बारे में चर्चा करतीं हैं। और हमें यह प्रश्न होता कि मराठियों में वैश्य जाति के सरनेम क्या होते होंगे। घर में चर्चा की तो अंत में यह निष्कर्ष निकला कि मराठे युद्धवीर थे अतः वहाँ अन्य लोगों ने आ कर व्यवसाय किया। वहाँ वैश्य जाति नहीं है। हमारे लिये तो यह निष्कर्ष भी आल्हादक था, कि हम औरों से अलग हैं। यह सारी जिज्ञासाएं हम उन बहनों की हैं जो पूरी ज़िन्दगी मराठी होते हुए भी, महाराष्ट्र में नहीं रहीं और इस संबंध में अज्ञान थीं। असल में हमें कभी इसकी आवश्यकता भी महसूस नहीं हुई। इसलिए इस संबंध में कुछ भी नया जानना हमारे लिये किसी डिस्कवरी से कम नहीं होता था !
हम बहनें अपने में रही संगीत एवं कला-प्रीति को अपने मराठी-पन से जोड़ती हैं और भाषा-उच्चारण की शुद्धता को भी इसी विरासत की देन मानती हैं। 'एक वार- दो टुकड़े' के अपने रुखे स्वभाव को भी मैं इसी विरासत की देन मानती हूँ।
इसी क्रम में मुझे पता चला कि मराठी के ख्यातनाम विद्वान और लेखक (स्व)कृष्णाजी पांडुरंग कुलकर्णी(1893-1964) मेरी माँ के सगे फुफेरे भाई लगते थे। उन्होंने मराठी भाषा पर कुछ लिखा है- ऐसा मेरी 78 वर्षीय माँ ने इन गर्मियों की छुट्टियों में बातों-बातों में मुझे बताया। 86 वर्षीय पिताजी ने दावा किया कि उन्होंने उनकी किताब पढ़ी ही नहीं, बल्कि साक्षात् कृ.पां जी को सुना भी है। बस फिर क्या था---- फ़ोन, नेट, पद्मजा घोरपड़े, मेहता पब्लिशर्स, ......करते-करते उनकी एक किताब और काफ़ी सारी जानकारी प्राप्त कर ली। किताब मैंने पढ़ी।' मराठी भाषा उद्भव व विकास' ।
इतनी लंबी भूमिका का कारण यह है कि मेरे सारे सवालों तथा जिज्ञासाओं के उत्तर मुझे मेरे ही पूर्वज की पुस्तक से मिल गए। मैंने जाना कि पाणिनी-काल के बाद में महाराष्ट्र में जो बस्तियाँ बसीं और व्यवस्थित रूप से मराठी भाषा, मराठी धर्म और मराठी साहित्य की रचना का आरंभ हुआ, वह यादव-कालीन महाराष्ट्र से होता है । ये वे यादव हैं जो उत्तर से आ कर महाराष्ट्र में बस गये थे। भिल्लम पहले राजा थे, जिनके राज्यकाल में मराठी-जन की समृद्ध विरासत ने आकार ग्रहण किया। लगभग इस वंश के आठ राजा हुए जिनके राज्यकाल में मराठी साहित्य का उद्भव और विकास का आरंभिक चरण संपन्न हुआ। यही महानुभावों का भी समय था और यही ज्ञानेश्वरी का भी समय था। इस विरासत को तो हम संसार भर में रह रहे मराठी अपने हृदय का अंश मानते हैं। पर इतिहास कहता है कि 100 वर्षीय यादव कालीन साम्राज्य में यह सब हुआ। ख़ैर, यह तो इतिहास की बात हुई। मेरी समझ में यह आया कि सांस्कृतिक और धार्मिक महाराष्ट्र की पहचान यादव-कालीन ज्ञानेश्वरी से होती है और राजनैतिक महाराष्ट्र की अस्मिता शिवाजी से पहचानी जाती है। संस्कृति पर यों भी राजनीति केवल महाराष्ट्र में नहीं , पूरे भारत में हो रही है। यह जय हे की कर्ण-भेदी ध्वनि कश्मीर से ले कर तमिलनाडु तक सुनाई पड़ रही है। यह हमारी अपनी परंपरा है- संस्कृति–धर्म-राजनीति की समेकित परंपरा, कौरवों-पांडवों से ले कर अंबानियों और ठाकरे बंधुओं तक बनी हुई है, इसमें कोई क्या कर सकता है।
मैंने जिस बात की ओर इशारा किया वह यह कि इस पुस्तक में लेखक ने इतने वैज्ञानिक ढंग से उस भूमि के बारे में, जिसे आज हम महाराष्ट्र के नाम से जानते हैं, उस पर कब-कब और किस-किस तरह लोग आए, बसे, किस तरह जातियों का निर्माण हुआ, किस तरह मराठी भाषा बनी---- आदि जानकारी दी है कि मुझे कभी हजारीप्रसादजी याद आते तो कभी रामविलासजी। हिन्दी जाति के विषय में जिस तीव्रता से रामविलासजी की जिज्ञासा जगी होगी उतनी ही तीव्र निष्ठा से इस पुस्तक में मराठी जाति के विषय में दिखाई पड़ती है।
मुझे यह जानकारी मिली कि वर्षों तक यह पुस्तक एम.ए के पाठ्यक्रम में रही है। अब पिछले कुछ वर्षों से नहीं है। लेकिन मेरे लिये यह अधिक महत्वपूर्ण था कि मैं जिन उत्तरों की खोज में थी उन तक मैं पहुँच सकी।
एक बार एक ज्योतिषी ने मुझे बताया था कि आपका अपने ननिहाल से गहरा ऋणानुबंध रहेगा। इससे गहरा ऋणानुबंध क्या होगा जो मुझे ठेठ अपनी अस्मिता की जड़ों तक ले गया !

2 टिप्‍पणियां:

  1. अपनी जड़ों को जानने की इतनी ज़िद तो लाजिमी ही है.. रही बात देश भर में चल रहे 'जय हे' के शोर की तो उसे भी आप ने बेहतर ढंग से समझा है.. बहुत संतुलित तरीके से, शिवा जी से कुछ आगे-पीछे महाराष्ट्र को जानना अच्छा लगा.
    हाँ, आपके कुलपति जी की टिप्पणी दुखद लगी, पर उससे दुखद शायद ये तथ्य है कि ये कुर्सियाँ विभेद के ऐसे ही पायों पर टिकी होती हैं. फिर भी चलिए आपने वहां भी अपने काम की प्रेरणा तो निकाल ही ली...
    ब्लाग पर पहली बार आया हूँ...संतुलित लिखतीं हैं आप.. शुभकामनायें.

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