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शुक्रवार, 21 अक्टूबर 2011

आग के आईने में माटीगंधी कविता के असमाप्त बिरवे

2011 का वर्ष आया और अब समाप्त भी हो जाएगा। पूरे वर्ष देश-भर में शताब्दी समारोहों के आयोजन होते रहे और दिसंबर अंत तक कुछ और स्थानों पर भी होंगे। लेकिन इस शताब्दी वर्ष में जो दबी-खुली शिकायत प्रायः लोगों की रही वह यह भी कि चारों पर एक साथ कां ही जगहों पर आयोजन हुए। या तो चारों पर अलग-अलग या कभी दो, कभी तीन। या कभी केवल एक। इस अर्थ में हैद्राबाद विश्वविद्यालय को बधायी देनी चाहिए कि उन्होंने चारों कवियों पर एक साथ चर्चा करना मुनासिब समझा। अगर केवल हिन्दी की ही बात करें तब भी 2011 केवल शमशेर, अज्ञेय, केदारनाथ अग्रवाल तथा नागार्जुन का ही शताब्दी वर्ष नहीं है परन्तु यह गोपालसिंह नेपाली तथा उपेन्द्रनाथ अश्क का भी शताब्दी वर्ष है। इस वर्ष कितनी ही पत्रिकाओं ने, लगभग सारी महत्वपूर्ण पत्रिकाओं ने, शताब्दी कवियों पर अंक निकाले जिनमें से कुछ में नेपाली और अश्क का भी समावेश किया गया है। 1911 से 2011.... यह 1911 इतना महत्वपूर्ण क्यों है। इस की इस विशेषता पर बहुत पहले प्रभाकर माचवे ने लोकप्रिय सीरीज़ में नागार्जुन पर कविताएं संपादित करते समय इशारा किया था। लेकिन वह 1977 की बात है और इन कवियों की शताब्दी आने में तब बहुत समय शेष था । संभवतः 2011 के पूर्व इस प्रश्न पर हमने गंभीरता से विचार ही नहीं किया कि 1911 का इतना महत्व होगा। क्योंकि यह बात हमें पता है कि 2000 के बाद हर वर्ष किसी न किसी रचनाकार की जन्मजयंति आने ही वाली है।
लेकिन भारतीय साहित्य के अध्येता के रूप में 2011 के आते ही धीरे धीरे क्रमशः हमारे सामने यह संयोग और आश्चर्य खुलता गया कि यह फैज़ अहमद फैज़ तथा मजाज़ का भी शताब्दी वर्ष है। यह तेलगु कवि श्री श्री का भी शताब्दी वर्ष है । यह गुजराती कवि उमाशंकर जोशी, श्रीधराणी तथा प्रह्लाद पारेख का भी शताब्दी वर्ष है। भारतीय साहित्य में ऐसे और भी कई नाम होंगे जिनका मुझे पता नहीं है, उनके नाम हम इस सूची में जोड़े जा सकते हैं। ऐसे इस समय आज जब हम, अपनी भाषा के केवल इन चार कवियों को याद कर रहे हैं तो असल में, हम अपने काव्यात्मक चुनाव तथा अपनी मर्यादा में रहते हुए उस वर्ष 1911 के इस चमत्कारिक संयोग पर ही सोच रहे हैं।
भारतीय लोकजागरण और भारतीय नवजागरण के बीच हमने एक लंबी नींद का आनंद उठाया। जागे तो देखा कि हमारी स्वतंत्रता बाधित हुई है। और इसे प्राप्त करने का संकल्प भी हमारे मन में बन चुका था। 1911 की प्रसिद्ध चीनी क्रांति के मार्गदर्शक सुन-यात्स-सुन की प्रेरणा से एम.एन रॉय, रासबिहारी वोज़ तथा लाला लाजपतराय जैसे भारतीय स्वतंत्रता के राष्टवादी नेताओं को साम्राज्यवादी ताक़त का सामना करने की तथा ब्रिटिश साम्राज्यवाद के विरुद्ध आवाज़ बुलंद करने की प्रेरणा मिली। इसी चीनी क्रांति द्वारा 267 वर्ष पुराने साम्राज्यवादी शासन का अंत हुआ था। यह अलग बात है कि फिर 1949 में इन राष्ट्रवादियों तथा कम्युनिस्टों के बीच खूनी संघर्ष हुआ तथा राष्ट्रवादियों की हार हुई। इस समय इसकी विस्तृत चर्चा का कोई अवकाश नहीं है, परन्तु चीन की 1911 की क्रांति के जो तीन सिद्धांत थे- लोकतंत्र, राष्ट्रीयता एवं जनकल्याण- वह हमारे लिए अब भी मौजूं हैं, वर्तमान कम्यूनिस्ट चीन के लिए हो न हो। देश की तत्कालीन शासकीय व्यवस्था के परिवर्तन की कामना के बीच काल के गर्भ में गोया इन रचनाकारों ने आकार ग्रहण किया। 1911 का महत्व हमें तब समझ में आएगा कि जब हम इसे भारतीय साहित्य की उस दैदिप्यमान स्वातंत्र्योत्तर पीढ़ी के साथ जोड़ कर देखेंगे जिसने साहित्य रचना के नए मूल्य-मापों को तय किया था। 2011 तक आते आते यह सोचना भी रोचक हो सकता है कि सौ वर्षों की यह यात्रा असल में कितनी वैविध्य पूर्ण रही है। 1910, 1911, 1912, 1913 में जन्मे हमारे इन्हीं कवियों ने हिन्दी की प्रगतिशील और प्रयोगवादी काव्यधारा का स्वरूप तय किया। स्वतंत्रता, लोकतंत्र, राष्ट्रीयता तथा प्रगतिशीलता हमारे स्वतंत्रता संघर्ष तथा स्वातंत्र्योत्तर काल के मूल्य बने रहे। छायावाद के बाद हिन्दी कविता का स्वरूप और आगे की कविता की दिशा को तय करने वाले ये हमारी भाषा के महत्वपूर्ण कवि हैं –इसमें तो संदेह नहीं ही हो सकता है। भारतीय इतिहास के नए अध्याय के रचे जाने की प्रक्रिया में जन्में इन रचनाकारों को पढ़ते पढ़ते साहित्य के पाठक के रूप में हमारी चिंतन एवं पठन-यात्रा विचारधाराओं से होते हुए विमर्शों के स्टेशन पर रुकते हुए अब सायबर स्पेस के अननोन ज़ोन में प्रवेश कर चुकी है। ये रचनाकार स्वयं भी अपनी रचना-यात्रा में इतिहास तथा विचारधारा के विभिन्न पड़ावों से गुज़रे हैं। लेकिन मुश्किल तो यह है कि रचनाकार अपनी सृजनशीलता में हमेशा खुला होता है पर आलोचक उसके एक हिस्से में, जो उसे सर्वथा प्रिय होता है , अपनी एक जगह बना लेता है जहाँ बैठ कर वह उसे परखता रहता है। उसका मूल्यांकन करता है। वह असल में रचनाकार को भी अपनी आलोचकीय कम-निगाही (तंग-नज़री) में बाँध लेना चाहता है ; पर रचनाकार के तो इरादे कुछ और ही होते हैं। क्या कहता है वह -
बहुत से तीर बहुत सी नावें बहुत से पर इधर
उड़ते हुए आए, घूमते हुए गुज़र गए
मुझको लिए सबके सब। तुमने समझा
कि उनमें तुम थे। नहीं नहीं नहीं ।
उनमें कोई न था। सिर्फ़ बीती हुई
अनहोनी और होनी की उदास
रंगीनियाँ थीं । फ़क़त।
रचनाकार तो अपनी रचनाओं में अपने समय को अंकित करता चलता है। अपने समय की छबियाँ, जो उसकी नज़र से गुज़री हैं, उसकी कविता में प्रतिबिंबित होती हैं। हर कवि एक ही समय की उन्हीं छबियों को अलग कोणों से अथवा दृष्टि से देखता है। दृष्टि- स्थान के बदल जाने से छवि ही बदल जाती है कई बार। ये हमारा समय कैसा है- जिसमें विद्वान अँधेरा है और ढपोरशंखी सूर्य हैं, जिनके सहारे हैं हम और हमारा यथार्थ भेड़िये-सा भयंकर हो गया है /यथार्थ/जिससे बचाव नहीं है। (केदारनाथ अग्रवाल,आग का आईना पृ-27) हमारा समय असल में चर्चा का समय है। हम मीटिंग, सेमीनार तथा वर्कशॉप के दौर के लोग हैं। समस्याओं को बातों में सुलझाते हैं – आग जल रही है / किताबों में लपालप/ कागज़ नही जलता/ हाथ में उठाए किताब सूरज की / आदमी अँधेरे में बैठा है। (केदारनाथ अग्रवाल,आग का आईना लेकिन कवि का काम तो इस विद्वान अँधेरे में भी उस आदमी को खोजना है जो आदमी है,और अब भी आदमी है/ तबाह हो कर भी आदमी है, चरित्र पर खड़ा है देवदार की तरह बड़ा(है)( केदारनाथ अग्रवाल, वही )
कविता ऐसा क्या करती है कि उसकी हमें ज़रूरत हो; हम जो आज इतने अकेले पड़े हुए लोग हैं कि कई बार अपने घरों में ही अकेले पड़ जाने की स्थिति में आ गए हैं। गाँव अब वैसे गाँव नहीं रह गए हैं और शहर अधिक निर्दय और कठोर हो गए हैं। कोई भी ऐसा नहीं मिलता जिसे अपना कहें ( शमशेर बहादुर सिंह, सुकून की तलाश वाणी प्रकाशन 1998) राजनीति का कुलिश बढ़ गया है- कैसा सियासत का तूफ़ान कि आग की लपटों में इन्सान/ अपनों पर अपनों की ही बेदादगरी क्यों बाक़ी है।( शमशेर बहादुर सिंह, काल, तुझसे होड़ है मेरी, वाणी प्रकाशन,1988) तब इन कवियों का यह रचनाभाव हमें अपने को अपने में और समाज में अधिक गहरे रोपने में कितना काम आता है। कविता अँधेरा फाड़ कर रात को तिरोहित कर देने का काम नहीं वरन् सृष्टि की समग्रता को धूप के पारदर्शी आइने में उजागर कर देने का काम भी सृजन करता है/ और ऐसे समर्थ और साहसी सूरज को –उसके ताप-दाप और प्रकाश के साथ शब्दों में बिम्बित करने का काम कविता करती है। ( केदारनाथअग्रवाल, रास्ता इधर से है, पीपल्स पब्लिशिंग हाउस,1978)
हमारे इन शताब्दी कवियों ने कविता के अलावा निबंध, उपन्यास, आलोचना आदि गद्य विधाओं में भी बहुत महत्वपूर्ण काम किया है। कथा-साहित्य में अज्ञेय और नागार्जुन अपने समकालीन गद्यकारों से इस मायने में आगे हैं कि जो प्रमुखतः गद्यकार हैं उन्होंने इतनी सशक्त कविता नहीं लिखी है। समकालीन रचनाकारों का मूल्यांकन हो, या साहित्य का तुलनात्मक अध्ययन हो अथवा नारीवादी आलोचना हो- शमशेर अपने कई समकालीन आलोचकों के पीछे तो नहीं ही हैं। लेकिन अगर हम कविता की बात करें तो भाव तथा विचार और भाषा-शिल्प तथा संरचना (एकदम सस्यूर की समझ में नहीं तो केवल रूपाकार की तरह से ही) की बात तो करेंगे ही। आज जब भाव तथा विचार का स्वरूप और उसके प्रति हमारी समझ में ख़ासा परिवर्तन आ चुका है , अब हम पुरानी खोल में नए लोग हो गए हैं , तब इन कवियों – चार या बारह, या और अधिक- के काव्य विश्व के विषय में किस तरह सोच सकते हैं। अब जब न प्रकृति–मनुष्य-ईश्वर, भाषा-अभिव्यक्ति-संदर्भ, देश-काल-सापेक्षता- सभी के विषय में हम ठीक वैसा नहीं सोचते , तो ये हमारे कवि ( शमशेर-जनवरी, अज्ञेय-मार्च, केदारनाथ अग्रवाल–जुलाई तथा नागार्जुन-जून) क्यों हमारे लिए महत्वपूर्ण हैं। अब जब कभी-कभी यह चर्चा भी होने लगी है कि क्या सचमुच साहित्य की आवश्यकता है भी, सिवाय कि मेरे आपके तरह के लोगों के लिए एक आजीविका के साधन के रूप में....!?!
इसमें कोई संदेह नहीं कि कवि का शिल्प और शैली कविता की ज़िन्दगी की दीर्घता तय करते हैं। इस संदर्भ में मुझे लगता है कि नागार्जुन की कविताएं हमारे समय की और आने वाले समय की बड़ी मूल्यवान कविताएं बनी रहेंगी। उनकी वे कविताएं जो अत्यन्त सामयिक हैं , वे भी अपनी शैली के कारण आकर्षण बनाए रखेंगी। नागार्जुन और शमशेर के यहाँ गीति काव्य-रूपों का तथा छन्दों का ग़ज़ब का वैविध्य है। इस पर बात हुई है। इसे सभी स्वीकारते हैं। नागार्जुन चूँकि संस्कृत, पालि , प्राकृत, मैथिली बंग्ला आदि के प्रकांड ज्ञाता थे अतः उनकी कविताओं में काव्य-रूपों एवं छन्दों का वैविध्य दिखाई पड़ता है। मुझे कई बार लगता है कि ये चारों कवि हिन्दी कविता के चार विलक्षण स्वभावों का प्रतिनिधित्व करते हैं। ये स्वभाव उनकी काव्य-शैलियों के निर्माण में सहायक साबित हुआ है। इन शैलियों को कवियों ने अपने जीवन से, अपने विभिन्न संस्कारों से ग्रहण किया हैं। इन चारों के काव्य-विश्व में एक विलक्षण बात सामने आती है। इनमें प्रकृति के प्रति जो अथाह प्रेम है वह जब इनकी कविता में प्रकट होता है तो कवि-स्वभावानुकूल ही। अज्ञेय की प्रकृति बड़ी अनुशासनबद्ध लगभग औपचारिक-सी खिलती खुलती है तो नागार्जुन के यहाँ प्रकृति एकदम उन्मुक्त खुला जंगल। शमशेरजी की कविताओं में प्रकृति ऐन्द्रीयता से भरपूर, निजत्व भावों से सभर तो केदारनाथ अग्रवाल की लोकरंग में रंगी प्रकृति दिखाई सर्वत्र पड़ती है। यह प्रकृति केवल बाहर की नहीं है परन्तु भीतर की भी है। जैसे कवि की श्रेष्ठता को मापने का एक मापदंड उसका स्त्री के प्रति दृष्टिकोण माना गया है उसी तरह काव्य-वस्तु के प्रति कवि के रुख की पहचान करने का एक मापदंड उसका प्रकृति-चित्रण हो सकता है। प्रकृति-चित्रण हिन्दी में अपने पूरे जोम पर छायावाद में देखा गया है। परन्तु छायावादियों का प्रकृति के प्रति नज़रिया एक जैसा तो नहीं था। प्रकृति मनुष्य की निकटतम सहचर है- गोत्र की दृष्टि से। (प्राणियों का तो वह सगोत्र ही माना जाएगा) प्रकृति के प्रति कवि का व्यवहार उसके इतर सामाजिक व्यवहारों को पहचानने में निश्चय ही सहायक हो सकता है। तभी इन चारों की कविताओं में अभिव्यक्त प्रेम भी ऐसा ही है और थोडा और गहरे जाओ तो इन चारों में आता समाज भी ऐसा ही है। ये चार हिन्दी-कविता की रचनागत-शैलियों को रेखांकित करती हैं। यानी कि उन्मुक्तता, ऐन्द्रियता, शालीनता (औपचारिकता) तथा लोकरंगिता- इन चार स्वभावों की कविता का प्रतिनिधित्व ये कवि करते हैं। केदारनाथ प्रकृति से मनुष्य-हृदय तक जाते हैं- अब भी है कोई चिड़िया जो सिसक रही है , नील गगन के पँखों में, नील सिंधु के पानी में , मैं उस चिडिया की सिसकन से सिहर रहा हूँ, वह चिड़िया मानव का आकुल हृदय है। (आग और बर्फ की वसीयत, फूल नहीं रंग बोलते हैं) इसलिए उनकी चिंता हमेशा समाज के आखिरी मनुष्य के सुख-दुख के साथ जुड़ी हुई थी। इसीलिए उनकी प्रकृति में वह औपचारिकता नहीं थी जो हमारे संभ्रांत समाज का लक्षण है, जिसमें हम और आप रहते हैं। मैंने धूप से कहा कि थोड़ी गर्मायी दोगी उधार - कविता के कवि की हम आलोचना चाहे करें पर हमारा विश्व भी यही है... एक बड़ी औपचारिकता और शालीनता इस कविता में दिखाई पड़ती है। एक संभ्रांत कल्चर। एक ऐसा कल्चर जो जाने अन्जाने हमने स्वीकार कर लिया है। संभवतः इसीलिए हमें केदारनाथ और नागार्जुन की प्रकृति का उन्मुक्तपन अच्छा लगता है। प्रेयसी को कलगी बाजरे की कह देने की स्पष्टता की अपेक्षा कठोर प्रेमिका से कन्फ्रंट करने वाले शमशेर की प्रेमिका और प्रकृति हमें भाती है कि अपनी तरफ़ से हम युद्ध-विराम यह कह कर घोषित कर देते हैं--- कि अगले जनम में....। हम सब ऐसे हैं।
निराला के बाद उनकी परंपरा में प्रायः नागार्जुन को रखा जाता है। इसका कारण है कि इन दोनों में ही ओजत्व है। नागार्जुन की कविता को आप पढ़ना शुरु करें तो प्रत्येक शब्द में से नागार्जुन ज़िंदा होते दिखाई पड़ते हैं। अक्षर-देह से वास्तविक नागार्जुन बाहर आते दिखाई पड़ते हैं। नागार्जुन में साहस है, रणनीति है, निश्छलता है और कवि होने के शौक़ से अधिक कवि होने की ज़िम्मेदारी दिखाई पड़ती है। यह ज़िम्मेदारी कविता के प्रति उन्मुख न हो कर काव्य-वस्तु के प्रति अधिक है। इसीलिए नागार्जुन के शब्द जहाँ काटो तो खून नहीं कि मुद्रा में अगर होते हैं तो ग़ज़ब के खिलंदड़ेपन को प्रकट करते हुए भी दिखाई देते हैं। नागार्जुन की कविता बोलती है। खड़ीबोली कविता के इस गुण का विकास नागार्जुन के यहाँ ख़ूब इफ़रात से हुआ है। उनकी कविता जहाँ राजनेताओं की ऐसी-तैसी कर सकती है वहीं किशोरों को भी लुभा सकती है। जो जीवन को पूरा का पूरा जिएगा वह हर तरह की कविता इफ़रात में लिखेगा। यह तो अच्छा ही है कि कवियों का जीवन आलोचकों के हाथ में नहीं होता, न ही विचारकों के, वरना कितने ही कवियों की कविताएं रचना की सुबह नहीं देख पातीं।
इस संदर्भ में यहाँ मुझे नागार्जुन के संदर्भ में दो प्रसंगों का उल्लेख करने का मन होता है। पहला प्रसंग है खंडवा में श्रीकान्त जोशीजी के घर किसी प्रसंग में मैं शमशेरजी के साथ गयी थी। वहाँ बाबा भी आए थे। जोशी जी का घर सरकारी क्वार्टर की तरह था, बहुत बड़ा नहीं था। बरामदा, बैठक, रसोई, ग़ुसलख़ाना, फिर एक और कमरा और दूसरी तरफ़ एक और कमरा(शायद)। शमशेरजी, जोशीजी और अन्य लोग बैठक में बैठे बातें कर रहे थे। उस दिन पानी की क़िल्लत थी , मैं ग़ुसलखाने से होते हुए उस कमरे में आई तो बाबा वहाँ थे किसी से बात करते हुए। मेरे पहुँचने के बाद वे मुझसे बात करने लगे। फिर थोड़ी देर में मैंने देखा कि हम दोनों ही उस कमरे में हैं। बात विचारधाराओं के आग्रह या दुराग्रह तथा कविता पर एवं आलोचना पर पड़ते असर की थी। अचानक बाबा ने कहा कि इनका(प्रगतिशीलों) का बस चलता तो वे मुझे मार-डालते( यहाँ इसे लक्षणा में लिया जाए) पर मैं टिका रहा। उनकी आँखें भर आईं थीं। उस समय आज की तुलना में मेरी उम्र काफी कम ही थी( यह 82-83 की बात है) और समझ भी कम ही थी। अतः मैं अपने मंतव्यों को रखते समय भविष्य की सोच नहीं रखती थी। फिर विचारधारा और विचारधारा का वहन एवं प्रचार-प्रसार करने वालों के बीच की फाँक कई बार देख चुकी थी अतः अनुभव को बिना पकाए रखने में भय महसूस नहीं करती थी। ऐसी ही मेरी किसी बात की प्रतिक्रिया में बाबा ने वह बात कही थी। दूसरा प्रसंग दिल्ली का है जो मैं भूल नहीं सकती। एक बार कनाट प्लेस में मैं बाबा के साथ कहीं जा रही थी। हम लोग पैदल चल रहे थे और दुनिया भर की बातें हो रही थीं। बाबा सीधे सामने देख कर चल रहे थे और बात कर रहे थे मुझसे और मैं उन्हें सुनने के लिए उनके चेहरे की ओर देख रही थी। उस समय वहाँ जो दफ्तर थे उनमें लंच-ब्रेक था और लोग दफ्तरों से बाहर आए हुए थे। बाबा ने सहसा कहा कि तुम को पता है कि ये लोग तुम्हें मेरे साथ देख कर क्या सोच रहे होंगे। कह रहे होंगे कि यह बुड्ढा बड़ा रंगीन है..... एक जवान लड़की के साथ घूम रहाहै। यहाँ इस हमारे समाज में लोग स्त्री-पुरुष को जब एक साथ देखते हैं तो केवल यही सोचते हैं। यह हमारा समाज है। अचानक हुए इस सवाल –जवाब के लिए मैं तैयार तो नहीं थी। पर एक संवेदनशील कवि का भीतरी और बाहरी संघर्ष अवश्य ही आज इसमें मैं देख सकती हूँ। एक विचारशील ज़िम्मेदार कवि को जब ऐसा कहना पड़ता होगा तो वह उसे हल्केपन-से कभी नहीं कहता। पर बाबा में यह साहस था , जीवन में और कविता में कि वह ऐसा कह सकते थे। कवि जिस समाज में रहता है उससे उसका संवाद किस तरह का हो सकता है, यह भी उसकी कविता के द्वारा प्रकट होता है।
कहने का अर्थ मेरा इतना ही है कि कवि स्वयं विचारधारा के बाहरी दबाव को स्वीकार नहीं कर सकता है, क्योंकि वह प्रकृति से स्वतंत्र होता है। स्वतंत्रता के संदर्भ में अज्ञेय और शमशेर का नाम तो हमें लेना ही होगा। परन्तु इस बात को ध्यान में रखते हुए कि स्वतंत्रता की संकल्पना भी कवि-प्रकृति के अनुसार ही होगी। शमशेर प्रेम में ऐसी स्वतंत्रता की कामना करते हैं- तुम मुझसे प्रेम करो , जैसे मैं तुमसे करता हूँ। व्यक्तिगत प्रसंग में स्वतंत्रता अगर समानता के लिए है तो जनता की एकता जनता की स्वतंत्रता को बचाने के लिए ज़रूरी है यह बात वे वाम वाम वाम दिशा कविता में कह चुके हैं। अज्ञेय प्रेम को अधिक प्रगाढ़ बनाने के लिए प्रेम में मुक्ति और स्वतंत्रता की बात करते हैं। उनके लिए प्यार अकेले हो जाने का एक नाम है / यह तो सब जानते हैं/ पर प्यार अकेले छोड़ना भी होता है /इसे /जो वह कभी नहीं भूली /उसे ,जिसे मैं कभी नहीं भूला..
जैसे नागार्जुन की कविताओं में से एक ज़िंदा होता चेहरा दिखाई देता है उसी तरह अज्ञेय की तथा शमशेर की घुलती हुई तस्वीर उनकी कविताओं के शब्दों में प्रकट होती है। नागार्जुन का चेहरा उभरता–सा है और इन दोनों का चेहरा घुलता–सा है। जबकि केदारनाथ अग्रवाल अपने शब्दों के सहचर हैं- जैसे वे अपनी कविताओं में प्रकृति के सहचर हैं, जैसे मज़दूरों-किसानों के सहचर हैं, जैसे अपनी पत्नी के सहचर हैं...। कविता को समझने की यह प्रक्रिया, यह भाव-संबंध शब्दों का, कवि की रचनात्मकता से हम जोड़ सकते हैं।
ये चारों कवि सही अर्थों में साहित्य-जीवी थे। यानी अगर वे लिख नही रहे होते , तो होते भी क्या, यह प्रश्न हमें होता है। आजीविका के लिए चाहे आप सम्पादकत्व करें या वक़ालत, पर जीने के लिए तो कविता उनके लिए साँस के समान ही थी। जो सूरज को आईने कहता हो(के.ना) और जिसकी पुतलियों में सूरज डूबता हो(श.ब.) ऐसे कवि हमारे लिए हर समय ज़रूरी रहेंगे क्योंकि ज़मीन का ज़मान नही बदला है (के.ना) ज़मीनी यथार्थ का पैकेज़ बदलता है, उसके भीतर के कंटेंट में कुछ परिवर्तन आता भी है परन्तु मूलभूत तत्व तो एक ही रहते हैं।
आज की आलोचनात्मक भाषा में बात करें तो नागार्जुन और रवीन्द्रनाथ के बादल के घिरने की रूमानियत जहाँ हमें कालीदास की हायपरटेक्स्ट में ले जाती है, वहीं फिर भी क्यों मुझको तुम अपने बादल में घेरे लेती हो ... आज नई पीढ़ी के पाठकों को शमशेर की यह ऐंद्रीय रूमानियत किसी तेल या शैंपू के कारण बने घने बालों के संदर्भ दृश्य की ओर ले जा सकती है। दे देने की उदार और मानवीय गरिमा के सर्वोत्तम भाव का जब लगभग तिरोधान हो चुका है और विज्ञापनों की मायावी और अ-वास्तविक दुनिया में बैठे हम लोग क्या केवल एक सेमीनार के लिए ही इन कवियों को याद कर रहे हैं या मुट्ठियों से फिसल रही अपनी संवेदनाओं को बचाने के लिए उन्हें बार-बार याद करना चाहते हैं।
हमारे इस समय में एक और भी बात है जो हमारे पारिवारिक भाव को चुनौति देती रहती है। हमारे समाज में जनता का नेतृत्व करने वाले लोगों के पारिवारिक भाव को जनता ध्यान से देखती है। इस पारिवारिक भाव में अन्य संबंधों की अपेक्षा पत्नी के प्रति भाव का एक ख़ासा मूल्य है। समाज का भावनात्मक नेतृत्व कवि-साहित्यकार करता है। केदारनाथ अग्रवाल पत्नी के लिए लिखी कविताओं के लिए प्रसिद्ध हैं। वे स्वयं इस बात को स्वीकारते हैं कि जैसा मैंने अपनी पत्नी पर लिखा और किसी ने नहीं लिखा होगा।(रामशंकर द्विवेदी के साथ की बातचीत साहित्य-अमृत, जनमशती अंक फरवरी 2011) केदारनाथ ने अपनी पत्नी के प्रति भाव को प्रकृति में मिला लिया। क्योंकि प्रकृति ही रहने वाली है। मैंने पहले उसको अपने शरीर में लिया फिर अपनी चेतना का अंश बना लिया, तो वह मेरे आत्मप्रसार की रमणी बन गयी।(वही)। कोई द्वंद्व नहीं है उनके भीतर। तुम मुझे प्रेम करो मैं तुम्हें प्रेम करूँ- इतना काफी है। फिर चाहे तुम राम से करो कृष्ण से करो जैसे मैं प्रकृति से करता हूँ। कोई जैलेसी नहीं। नागार्जुन अपनी सिंदूर तिलकित भाल कविता में भी पत्नी को याद करते हैं तो पूरे ग्रामीण परिवेश के साथ याद करते हैं। अज्ञेय के लिए पत्नी उनका घर है, बल्कि घर की एकमात्र खिड़की जिससे वे दुनिया को देखते समझते हैं। घर और पत्नी इतने घुल-मिल गए हैं कि उन्हें यह याद भी नहीं रहता वैसे ही जैसे सांस लेते हुए हमें याद नहीं रहता कि हम सांस ले रहे हैं। शमशेर अपनी मृत पत्नी याद करते हुए कहते हैं कि-
तुम आओ तो ख़ुद घर मेरा आ जाएगा, इस कोनों-मकाँ में तुम जिसकी जिसकी हया हो, लय हो, तुम मुझे इस अंदाज़ से अपनाओ जिसे दर्द बेगानारवी कहें, बादल की हँसी कहें, जिसे कोयल की तूफ़ान-भरी सदियों की चीखें, कि जिसे हम-तुम कहें। (आओ- 1949)
यहाँ दो भाव हैं- पत्नी के स्मरण को घर से बाहर के गाँव-जीवन और प्रकृति में मिला देना और प्रकृति –समाज को पत्नी के होने या स्मरण में मिला देना। क्योंकि समाज में इसी तरह की मानसिकता के लोग विद्यमान हैं अतः हर प्रकार के व्यक्ति के लिए ये कवि अपने कवि-स्वभाव के साथ महत्वपूर्ण हो सकते हैं।
शताब्दी स्मरण के इस मुहूर्त पर एक बात जो मुझे बहुत आकर्षित करती है वह यह है कि ये कवि उस पीढ़ी के हैं जब एक दूसरे के प्रति परस्पर सौहार्द्र का भाव बहुत घना था। यह एक जाना हुआ तथ्य है कि आलोचकों की विचारधारात्मक खींचतान या पूर्वाग्रह भी इन कवियों के परस्पर स्नेह संबंध को कम नहीं कर पाये थे। शमशेरजी को चाहे आलोचकों के एक वर्ग ने नयी कविता का प्रथम नागरिक कह कर अज्ञेय के विरोध में इस्तेमाल करने का प्रयत्न किया हो परन्तु उस समय तो उन्होंने इस बात को हवा नहीं ही दी बल्कि अंत तक वे अज्ञेय की प्रतिभा को स्वीकारते भी थे तथा उनके प्रति एक आदरभाव भी रखते थे। इस संदर्भ में हम मुक्तिबोध के प्रसंग को भी उदाहरण के रूप में याद कर सकते हैं जिसका खुलासेवार ब्यौरा रचनावली के पत्रों वाले भाग में उपलब्ध है। कवियों के लिए कविता की समझ अधिक महत्वपूर्ण होती है, विचारधारा नहीं। स्वयं शमशेर ने जब प्लॉट का मोर्चा लिखा तब उसे पहले अज्ञेय को दिखा कर ठीक कराना चाहते थे। विशेषकर भाषा की दृष्टि से। यह भी एक संयोग है कि इन दोनों कवियों की बीमारी में (हालाँकि वर्षों का अंतराल बहुत बड़ा है) अपनी तरफ़ से ठोस मदद के लिए चुपचाप कोई समकालीन कवि सामने आया , तो वह अज्ञेय ही थे। शमशेर जी की अज्ञेय पर लिखी कविता तो प्रसिद्ध है ही। बल्कि उन्होंने अज्ञेय पर दो कविताएं लिखी हैं। शमशेर ने नागार्जुन पर भी कविता लिखी है। नागार्जुन ने केदारनाथ अग्रवाल पर लिखी है। केदारनाथ ने नागार्जुन पर लिखी है और शमशेर पर भी लिखी है। शमशेर पर उनके बाद की पीढ़ियों के लेखकों ने लिखा है। यहाँ सवाल परस्पर के सौहार्द्र का है जो अब धीरे-धीरे क्षीण होता जा रहा है। एक दूसरे के प्रति स्पर्द्धा का भाव किसी भी युग के रचनाकारों में होना सहज स्वाभाविक है। इस तरह की खोज हमारे यहाँ कम हो पायी है। एक बार नाट्यदर्पण की भूमिका पढ़ते हुए मैंने पाया कि यह बात रामचंद्र-गुणचंद्र के समय में भी थी। निराल-पंत के संदर्भों से हम परिचित हैं । परन्तु एक दूसरे के प्रति सौहार्द्र भाव की खोज कर के उदाहरण सामने रखना हमारे आज के समय की आवश्यकता है। अपने समकालीनों का आदर करने की जो संस्कारिता इन कवियों से हमें दाय में मिली है, हमें उस परंपरा का वहन करना चाहिए। क्योंकि आज हमें उसकी सर्वाधिक आवश्यकता है। शमशेरजी की तो विशेषता ही रही है कि उन्होंने अपने समकालीनों, अग्रजों और अपनी पार्टी के लोगों पर , इतना ही नहीं घर के बसंता के नाम भी प्रेम की पाती लिखी है। उनके इस प्रकार की कविताओं का तो एक संग्रह भी हो सकता है। नागार्जुन ने भी इस प्रकार की कविताएं लिखी हैं। वे शैलेन्द्र पर भी लिखते हैं और सबसे आकर्षित मुझे इस बात ने किया कि उन्होंने राजकमल चौधरी पर भी कविता लिखी है। हमारी समकालीन आलोचना की परिधि में जो अनेक कवि नहीं आते उनमें एक राजकमल चौधरी भी हैं। भाव की दृष्टि से मुझे हमेशा ऐसा लगा है कि रील धुली तो गजानन माधव मुक्तिबोध दिखे और रील नहीं धुली तो राजकमल चौधरी दिखे। तस्वीर का नेगेटिव्ह राजकमल चौधरी है और पॉज़िटिव्ह गजानन माधव मुक्तिबोध। भाव के उदात्तीकरण की आवश्यकता कवि को कहाँ से कहाँ पहुँचा देती है उसके ये दोनों कवि उदाहरण हैं।
इस हमारे समय में जहाँ रचनाएं पाठ बन गयी हैं, पाठ अन्तर्पाठ बन गए हैं और अन्तर्पाठ हायपर टेक्स्ट और मैटा टेक्स्ट बन गए हैं। यानी कि अब हम एक सर्वथा नई दुनिया में सांस ले रहे लोग हैं। ( कई बार अपने से ही सवाल करने जी होता है- क्या सचमुच) हमारी दुनिया सर्वथा भिन्न हो गयी है। अब हम एक डिजिटल दुनिया में प्रवेश कर चुके हैं। पिछली शताब्दी के आरंभ से ले कर उसी शताब्दी के अंत अंत में इन कवियों ने अपना जीवन जी लिया था। मुझे याद है बाबरी मस्जिद वाली घटना के बाद भीतर तक हिल जाने वाले शमशेरजी ने बहुत पीड़ा के साथ यह वाक्य कहा था- मुझे नहीं मालूम था कि जीते जी अपने ही जीवनकाल में यह सब भी देखना पड़ जाएगा। यह सर्वथा अनपेक्षित तथा उनकी कल्पना के बाहर की बात थी। गोया अपने सामने समय को करवट लेते उन्होंने देखा । समय ने एक करवट ली ही थी कि वे मंच पर आए और समय की दूसरी करवट में तो हृदय-मन-सोच सब आलोडित हो कर जैसे कुचला गये हो।
हमारे ये विद्यार्थी जो हमारे सामने बैठे हैं उनकी और हमारी दुनिया में एक फर्क आ गया है। यह फर्क यथार्थ के परसेप्शन का फर्क है। हमारे उनके पठन में फर्क आ गया है। ज़रूरी नहीं है कि हम उन्हें साहित्य में प्रकट यथार्थ को अपनी कक्षाओं में जिस तरह पढ़ाते हैं, ठीक उसी तरह वे उसे परसीव करते हों। वे विचारधाराओं की उत्कटता से परिचित नहीं हैं, वे विमर्शों को ले कर ठीक वैसा नहीं सोचते , जैसा हम सोचते हैं। परीक्षा में तैयारी कर के हमारे पढ़ाए अनुसार लिखना एक बात है, पर जीवन-संदर्भों में उस पर विश्वास करना दूसरी बात है। यहाँ मैं उस प्रश्न को नहीं छेड़ना चाहती कि उनके लिए साहित्य के मायने क्या रह गए हैं। अगर वे साहित्य में एम.ए इत्यादि नहीं कर रहे होते तो क्या शताब्दी कवियों – इस वर्ष के नहीं बल्कि हर वर्ष किसी न किसी शताब्दी कवि को कितना पढ़ते और समझते। पसंद करने की बात यहाँ नहीं है।
तो क्या इसका मतलब यह हुआ कि शताब्दी कवियों को याद करना हम साहित्य के प्रोफेशनल्स का ही काम है। जैसे किसी भी क्षेत्र में विषय से जुड़ी किसी नई खोज पर सिंपोज़ियम होते हैं, वे चाहें मैनेजर्स हों या हैर-ड्रेसर्स हों, उसमें रुचि ले कर काम करते हैं। शताब्दी कवियों को याद करना क्या इस तरह की कोई बात है, या नहीं। तो, साहित्य आखिर हमारे सामाजिक जीवन में कौन-सी उपयोगिता छोड़ जाते हैं.. यह सवाल तो बना ही रहता है। अगर इन शताब्दी कवियों/रचनाकारों के साहित्य को हम प्रोफेशनल्स सचमुच मूल्यावान मानते हैं , तो ऐसा क्या हमें करना चाहिए कि हमारे अकादमिक और प्रोफेशनल क्षेत्र के बाहर जा कर हम व्यापक समाज के लोगों तक उसे पहुँचाने का काम करें। हमें अपनी परिक्षाओं और डिग्रियों से आगे जा कर क्यों इन रचनाकारों पर अलग से सोचना चाहिए। वे कौन-सी बातें इन रचनाकारों में हैं जो आज भी समाज को बेहतर बनाने में कामयाब हो सकती हैं। लेकिन सबसे पहले तो हमें अपने आप से एक सवाल पूछना चाहिए कि ऐसा करना क्या हम अपना काम मानते हैं। हम साहित्य के अध्यापकों के लिए यह बहुत आवश्यक हो गया है कि हम नए सिरे से चीज़ों पर सोचें। नहीं तो इतिहास से ले कर हायपर टेक्स्ट तक की जो गाड़ी हमारे सामने से गुज़र रही है वह और आगे चली जाएगी और हम वहीं अपने स्टेशन पर खड़े के खड़े रह जाएंगे – क्या हम यह एफोर्ड कर सकते हैं। जिन रचनाकारों का मूल्य हमने समझा है और वाक़ई में वे मूल्यवान हैं, उन्हें हम किस तरह आने वाली पीढ़ी तक ले जाएं, यह भी हमारा काम है।
हर पीढ़ी अपनी समझ और रुचि के अनुकूल रचनाकारों को स्वीकार करती ही है। प्रश्न इतना ही है कि हम इन रचनाकारों को आज उस माध्यम के द्वारा नई पीढ़ी तक ले जाएं। इसलिए सायबर स्पेस में जहाँ हर कोई सरलता से पहुँच सकता है, वहाँ तक इन्हें ले जाने का काम हमारा है। सायबर स्पेस में कविता के नए ठिकानों तक जा कर, उपलब्ध स्पेस में बेहतर सामग्री को शामिल करना हमारा काम होना चाहिए। विचारधारा और विमर्श इसमें आड़े नही आने चाहिएं। इस शताब्दी वर्ष में हमारी यह कोशिश होनी चाहिए कि हम प्रस्तुति और प्रकाशन के नए माध्यमों में अपने साथ-साथ इन अपने प्रिय और मूल्यवान रचनाकारों को भी शामिल करते चले जाएं, क्या मालूम कौन-सा नया पाठक वर्ग उनको पढ़ने के लिए उत्सुक तैयार बैठा है। इसके लिए हमें सबसे पहले तो अपने पूर्वग्रहों से निकल कर इन रचनाकारों की कविताओं की व्यापक भूमि को पहचानने की कोशिश करनी होगी। यह शिकायत भी लोगों को है कि कविता कोई नहीं पढ़ता। पर मेरे साथ आपका भी यह अनुभव होगा कि साहित्येतर क्षेत्रों के कई लोग अपने वक्तव्यों को पुष्ट अथवा अलंकृत करने के लिए भी कविताओं को तो खोजते ही रहते हैं। आम जन भी कविताएं पढ़ना पसंद करते हैं, सवाल यह है कि उनके पास कितनी ऐसी कविताएं उपलब्ध हैं और इस बढ़ती हुई मँहगाई में किस दाम पर वह ख़रीद सकता है। सायबर स्पेस में यह सुविधा है कि वह कम दामों(या मुफ्त) में उनको प्राप्त कर सकता है। मैं कोई विज्ञापन नहीं कर रही , पर आने वाले समय में अगर हम इस दिशा में नहीं जाएंगे , तो हम अपना ही नुक्सान करेंगे। अंत में नागार्जुन के स्वर को ध्यान से सुनें कि वह क्या कहते हैं-
दिन है/ शताब्दी समारोह के समापन का/ दिन है-पंडों की धूमधाम का/ दिन है धान रोपने का सावन का/ दिन है/ स्मृति की सरिता में प्लावन का..
नहीं, केवल स्मृति की सरिता में प्लावित होने के लिए ही यह शताब्दी स्मरण हम नही कर रहे परन्तु इन कवियों को पढ़ने का अर्थ है अपनी छूटती हुई साँसों को अधिक से अधिक जी लेने की कोशिश करना।
रंजना अरगडे

रविवार, 12 दिसंबर 2010

शमशेरजी को याद करते हुए


मुझे याद आता है कि जिस वर्ष शमशेरजी का देहावसान हुआ, उसी वर्ष मेरेसामने दो प्रस्ताव आए थे। पहला यह कि मैं शमशेरजी के साथ बिताए वर्षों के संस्मरणों पर एक पुस्तक लिखूं। दूसरा यह कि मैं रचनावली का काम तुरन्त आरंभ कर दूँ । मैंने पूछा कि रचनावली की इतनी जल्दी क्या है तो यह कारण सामने रखा गया कि देर होने से फिर लोग शमशेरजी को भूल जाएँगे, बाद में इस बात का इतना महत्व नहीं रहेगा। तब मैंने यह कहा था कि जिस कवि को लोग इतनी जल्दी भूल जाने वाले हों, उनकी रचनावली की आवश्यकता भी नहीं होनी चाहिए। जहाँ तक संस्मरणों का प्रश्न है मुझे इसमें इतनी रूचि इसलिए नहीं रही कि पिछले कुछ वर्षों से हिन्दी में संस्मरणों का दुरुपयोग भी बहुत हुआ है। उसकी विश्वसनीयता खंडित हुई है ; क्योंकि संस्मरणों के तथ्यात्मक आधार की जाँच हर बार संभव नहीं होती। फिर संस्मरणों की पुस्तकें मुझे कई बार शोक सभा की याद दिलाती हैं जिसमें व्यक्ति, मृतक की कम, अपनी ही बात अधिक करता है। अथवा कई बार यह भी होता है कि हम संस्मरणों के माध्यम से किसी की लकीर को छोटा कर के अपनी लकीर बड़ी करना चाहते हैं। मैं यह मानती हूं कि रचनाकार की रचनाएं ही अधिक महत्वपूर्ण होती हैं। बहरहाल, आज जब मुझे आपके सामने शमशेरजी के संस्मरण सुनाने हैं, तो मेरी कोशिश यही रहेगी कि इन्हें उस अर्थ में शोक सभा का रूप न मिले अथवा मैं किसी की लकीर को छोटा न करूं।
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मानों हम सहज ही कहीं टहलने निकल गए हों.....मसलन किसी नदी किनारे या किसी ऐसी जगह जहाँ सहसा बहुत कुछ घटित हो जाता है ; जैसे भरे बाज़ार में या मेले में..... 'क्या हो रहा है' का कौतुहल हमें अचानक, हमारे ही अन्जाने उस खेलते, लहर-लहर पानी के एक ऐसे प्रवाह में ढकेल देता है कि हमारे पास 'क्या किया जाए' इस बात पर सोचने का न तो विकल्प होता है न ही वक्त; और हम बस बहते चले जाते हैं प्रवाह के साथ-साथ... और ठीक वहीं और तभी जा कर रुकते हों जब प्रवाह की गति उसकी अनुमति दे।
अथवा मेले में खेल देखने की उत्सुकता से चले हों और हमारे हाथों में एक बेहद प्यारे, पर खो गए बच्चे की ज़िम्मेदारी आ पड़ती है और उस दिलक़श बच्चे को देख कर हमारे मन में भी यही विचार आता है कि 'अच्छा हुआ कि हम वहाँ मौजूद थे।'
अथवा भीड़ भरे बाज़ार में बीच सड़क पर कोई हादसा हुआ है और सभी अपनी-अपनी राह चले गए हों। आप भी उस हादसे के गवाह हों और लुहलुहान घायल को उसकी नियति पर नहीं छोड़ सकते क्यों कि यह वो शख़्स है जिसने मनुष्य जाति की भावनाओं को लहूलुहान होने से बचाया है ; जिसके भीतर के एकांत में मनुष्य, समाज, आत्मीयों की स्मृति, बेचैन हो कर घूम रही है , वह अपने घायल पाँवों पर खड़े रहने की ज़द्दोज़ेहज में जब आपकी ओर देखता है तो आपको सहसा अपनी एक छवि उसके भीतर दिखाई देती है। उसने कभी आपको बताया नहीं था कि आप उसकी बेचैन स्मृतियों का एक हिस्सा हैं, पर आप स्वयं अपने को जब वहाँ देखते हैं तो सिवा उस लहूलुहान अकेले व्यक्ति के साथ होने के, कोई और विचार आप के भीतर नहीं जागता।
इन तीन दृश्यों का मिला-जुला भाव और स्वरूप मेरे सामने थे जब वह निर्णय मेरे भीतर जगा और शमशेरजी ने मेरे साथ आने का चुनाव किया।
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शमशेरजी के साथ मेरी स्मृतियां तब से जुड़ी हैं जब 1978 में मैंने उनपर शोध करने का निर्णय किया और 1979 में मैं उनके समक्ष एक शोध-छात्रा के रूप में उपस्थित हुई थी। उन स्मृतियों में एक ऐसे कवि की छबि अंकित है जिसे अपने पर काम कराने या होने को लेकर कोई विशेष उत्साह तो नहीं ही रहता था, बल्कि, उनकी कोशिश यह रहती थी कि कोई ना ही करे तो अच्छा है। इसका कारण यह था कि उन्होंने अपनी कविताओं को इस तरह कभी नहीं देखा कि उनका कोई मूल्य हो, सिवा उनके लिए या उनकी तरह सोचने वालों के लिए। पर उनके समक्ष जो व्यक्ति उपस्थित है, जो इस प्रकार के या किसी भी प्रकार के कार्य के लिए पहुँचा हो. उसके आतिथ्य के प्रति वे सदैव ही तत्पर रहते थे। उस यात्रा में शमशेरजी को मैं अपनी आँखों से नहीं परन्तु उस व्यक्ति की आँखों से देख रही थी जिनके माध्यम से मैं वहाँ पहुँची। अतः मेरा उनके प्रति भाव पक्षपात से भरा हो, यह स्वाभाविक है। मैंने ख़ुद अपने ढंग से अपने अनुभव से तो शमशेरजी को बाद में जाना।
शमशेरजी के साथ मेरे अपने अनुभव उज्जैन और बाद में सुरेन्द्रनगर आदि के दिनों... वर्षों के हैं। ये अनुभव कई प्रकार के हैं। जिनमें शमशेरजी के साथ मेरे अपने, मेरे परिवार के साथ के, शमशेरजी के साथ उनके परिवार के, साहित्यकारों के साथ के आदि आदि। शामिल हैं। मैं उन्हीं में से कुछ आपके बीच बाँटना चाहती हूँ।
उज्जैन के दिनों की बातें मैंने इसके पहले भी कहीं-न-कहीं लिखी हैं। मैं यह भी जानती हूँ आज की यह कोई अनंत बैठक नहीं है कि मैं अपनी बातें कहती चली जाऊं। मुझे इस बात का भी एहसास है कि संभवतः बीमारी और उसके बाद के दिनों में शमशेरजी की क्या स्थिति थी और उनका जीवन किस तरह बीतता था यही जानने की उत्सुकता संभवतः लोगों के बीच अधिक है। मैं यह भी जानती हूँ कि एक यह उत्सुकता भी, शायद, हिन्दी प्रेमियों के बीच है कि आखिरकार धुर उत्तराखंड का जीव पश्चिमी खंड में कैसे जा कर बसा। फिर कौन है यह रंजना ? सैकड़ों शोध-छात्रों में यह एक शोध-छात्रा । हमारे समाज की यह भी एक विडंबना है कि इन्सान जब बदहाली से बच जाता है, तो अचानक उसकी ओर हमारा ध्यान जाता है। अरे! ! वरना यह चर्चा तो आम है कि हम अक्सर यह अफ़सोस जताते रहे हैं कि फ़लां कवि/लेखक के अंतिम दिन बड़े कष्ट में बीते। यह हमारी नकारात्मक भावनाओं का पोषण करती है और हमें एक तरह का संतोष भी देती है, कहीं-न-कहीं। हिन्दीतर भाषी परिवार में हिन्दी के इस महत्वपूर्ण कवि के दिन कैसे बीते होंगे, यह उत्सुकता अगर कौतुहल का मुद्दा रहा है, तो इस बात पर मुझे कोई आश्चर्य नहीं है। मैं इसे स्वाभाविक ही मानती हूँ।
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इस भूमिका के बाद अब मैं अपनी स्मृतियों को टटोलती हूँ तो मुझे दिखाई पड़ते हैं वह शमशेरजी जिनके साथ रहते हुए मुझे हमेशा यह लगा कि I was the chosen one!.
अहमदाबाद से उज्जैन अगर पास नहीं तो दूर भी नहीं था। एक रात का सफ़र। जाने के लिए गाड़ी तो तब एक ही थी, पर बसें दो-चार तो थी हीं। बस की यात्रा बहुत आरामदायक नहीं थी, क्योंकि राज्य परिवहन की सामान्य बसें तो जैसी थीं, वैसी थीं। और यह कोई आजकल की बात तो नहीं है। 1980 में हड्डियां दुखाने वाली सडकों पर चलती ये बसें मुझे कभी कष्टदायक नहीं लगी थीं क्योंकि एक तो उम्र ऐसी थी और दूसरे कोई विकल्प भी नहीं था। शाम होने से पहले यानी 6 बजे से पहले अगर मन में इच्छा हो जाती तो साढ़े सात की बस पकड़ कर उज्जैन के लिए चल देती थी। शमशेरजी के यहाँ सभी के लिए जगह थी। उनकी आवभगत का अनुभव मैं दिल्ली में कर चुकी थी। चाय के लिए मना करने पर दूध का आग्रह रखने वाले शमशेरजी के यहाँ जाने के लिए भला संकोच होने का कोई कारण नहीं था। ऐसी ही अनेक बार की यात्राओं में शमशेरजी से बढ़ता हुआ परिचय एक अधिकार-भरी आत्मीयता में बदलने लगा। शमशेरजी का व्यक्तित्व ही ऐसा था कि इस तरह का अधिकार-भाव रखने वाले कितने ही लोग उज्जैन में मैंने देखें हैं। शमशेरजी सभी के लिए बाहें खोल कर ऐसे उपस्थित हो जाते कि हर कोई यह मानता कि शमशेरजी उनके विशेष निकट हैं। शमशेरजी से मेरा नाता कविता के माध्यम से जुड़ा था और मैंने यह पाया कि उन्हें कविता की मेरी समझ के प्रति विश्वास एवं आदर था जो वे अक्सर मेरे शोध-निर्देशक आदरणीय डॉ. भोलाभाई पटेल की तारीफ़ करते हुए प्रकट करते थे। इसी का परिणाम यह हुआ कि एक दिन उन्होंने मुझसे यह कहा कि जब यहाँ का ( प्रेमचंद पीठ) कार्यकाल पूरा हो जाएगा तो मैं अपना सारा सामान तुम्हारे यहाँ रखूंगा और मैं स्वतंत्र हो कर जहाँ मेरी इच्छा होगी , घूमूंगा। भविष्य की बात थी, मैंने उसे उतना ही महत्व दिया , जितना उस समय के लिए योग्य था। पर हाँ, मुझे ख़ुशी हुई कि शमशेरजी का मुझ पर भरोसा है। उनकी इस बात के पीछे नियति का क्या खेल था मैं तब नहीं जान पायी थी।
मैंने यह पहले लिखा है पर मुझे कहने का मन होता है कि उज्जैन में शमशेरजी अकेले रहते थे पर उनके यहाँ रोज़ चार लीटर दूध तो कम-से-कम आता था। फिर फल आदि की इफ़्रात। उनके घर के आँगन के पिछवाड़े एक बग़ीचा था जिस में अमरूद के पेड़ थे। उन पर अमरूद लगा करते थे। उस बग़ीचे के अमरूदों, गिलहरियों, चिड़ियों साँपो, मोर ( कभी - कभार आने वाले), अमरूद के पेड़ों से छनती आती धूप-छांही, सभी शमशेरजी की बातचीत का हिस्सा थे। उस आँगन में मैंने उन्हें योगासन करते हुए देखा है। आसन करते हुए बीच-बीच में वे आसनों की प्रक्रिया में होने वाली अनुभूतियों की बात करते और मुझे स्मरण आती उनकी वे कविताएं – सूर्य मेरी पुतलियों में स्नान करता....। मुझे प्लॉट का मोर्चा का वह रेखा चित्र भी याद आता और समझ में आता कि इन कविताओं में जो बिम्बों की जटिलता है वह एक विशिष्ट अनुभूति के कारण है। उस अनूभूति को समझ लेने पर कविता एकदम सरल हो जाती है। फ़्रांसिसी प्रतीकवादी कवियों ने प्रतीकों की जिस निजता की बात की है उसका रहस्य भी तभी समझ में आता है। शमशेरजी का नहाने का तरीक़ा बड़ा विशिष्ट था। अपना पायजामा ऊपर तक, लगभग जांघों तक, चढ़ाए, एक मग्गे में पानी ले कर, छोटा-सा तौलिया गीला कर के उस पर पीयर्स साबुन लगाते थे। पहले वे सूखे तौलिए से अपना बदन रगड़ते थे , फिर साबुन लगे गीले तौलिए से अपना बदन साफ़ करते थे और फिर एक बार साफ़ पानी में तौलिया भिगो कर बदन पर लगा साबुन साफ़ करते और अंत में एकाध मग्गा पूरे शरीर पर डाल लेते। यह उनका किफायती स्नान का प्रत्यक्ष उदाहरण था। (किफायत पानी की, समय की नहीं) यही किफ़ायत सुरेन्द्रनगर जैसे शहर में बड़ा वरदान साबित हुई थी।
शमशेरजी अमरूदों को देखते हुए इलाहाबाद को याद करते और इलाहाबाद को याद करते हुए बहुत कुछ उनकी स्मृति पटल पर खिंच जाता। ऐसे में ही उहोंने मुझे भुवनेश्वर के जीवन की ट्रेजेडी के विषय में बताया था। मैने तो भुवनेश्वर को नहीं देखा , ज़ाहिर है, पर शमशेरजी ने भुवनेश्वर का जो चित्र खींचा था मुझे हमेशा ऐसा लगा है, और आज भी ऐसा लगता है कि मैं भुवनेश्वर से मिल चुकी हूँ। मेरे कहने का अर्थ यही है कि शमशेरजी अपनी बात को जिस गहन आत्मीयता से कहते थे कि चाहे प्रसंग की बारीकियां आपको याद न रहें उसके प्रभाव आपके चित्त पर स्थायी हो जाते थे। इलाहाबाद के सिविल लाईन्स इलाके में रात-बे-रात घूमते(भटकते) भुवनेश्वर का चित्र, मानों , मेरी अपनी स्मृति का हिस्सा बन गया है। 'वग़रना तू भुवनेश्वर...' कविता में शमशेरजी ने अपने समय के इस कलाकार के बारे में कहा ही है। पर इतना तो है कि भुवनेश्वर की कला के प्रति आदर होते हुए भी शमशेरजी भुवनेश्वर के ख़स्ताहाल के लिए ख़ुद भुवनेश्वर को ही एक हद तक ज़िम्मेदार भी मानते थे।
मैं जब शमशेरजी के यहाँ उज्जैन जाया करती थी तब रोज़ उनके साथ सुबह घूमने का अवसर मैं नहीं चूकती थी। इन्हीं प्रातः-चालों में कला और कृति के मर्म को समझने की बारीकियां मैंने सीखी होंगी। सौन्दर्य किसे कहते हैं- यह शमशेरजी की कविताओं से तो जाना ही है पर अपने चारों तरफ़ के परिवेश में उसे कैसे देखना , यह मैंने उन्हीं से सीखा है। किसी पेड़ की जड़ें ज़मीन के नीचे किस दिशा में होंगी जिसके कारण वह ज़मीन के बाहर किसी विशेष दिशा में बढ़ता है, पेड़ों पर लगे पत्तों की संरचनाएँ किस तरह अलग-अलग होती हैं जिनसे पेड़ों को पहचाना जा सकता है, उनकी डालियों के बढ़ने और आकारों आदि की वे अक्सर चर्चा करते थे। मुँड़ेर पर बैठी गिलहरी या आँगन में पड़ते धूप-छाँही के रेखाचित्रों के सौन्दर्य तथा उनके साथ गोया कोई आत्मीय रिश्ता हो कुछ इस तरह उन पर वे जब बोलते थे तो मैंने मानों पहली बार जाना कि 'कवि' किसे कहते हैं। शमशेरजी के पास इस तरह की इतनी बातें थी और उनको इस तरह सुनते हुए मुझे मालूम ही नहीं हुआ कि धीरे-धीरे मैं सौन्दर्य-शास्त्र में दीक्षित हो रही हूँ। अपने आस-पास के परिवेश को कितनी बारिकी से किस तरह देखना चाहिए यह भी शमशेरजी के साथ की हुई प्रातः-चाल का ही परिणाम है।
लेकिन उज्जैन में चाहे आत्मीय ही सही, पर थी तो मैं एक मेहमान ही।
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शमशेरजी का कार्यकाल जिस अप्रैल( 1985) में पूरा होने वाला था और नरेश मेहता आने वाले थे , मैं उनसे मिलने चली गई। मैंने सोचा था उनसे मिलते हुए फिर मैं कहीं घूमने निकल जाऊंगी , क्योंकि गर्मियों की छुट्टियाँ पड़ने वाली थीं। मेरा एक स्वप्न था कि नौकरी करूंगी और छुट्टियों में भारत-भ्रमण का कार्यक्रम। पर सब कुछ बदल गया। शमशेरजी उज्जैन में नहीं थे। प्रेमलता वर्मा अपनी बेटी श्रुति के साथ आई हुईं थीं और शमशेरजी उनसे मिलने दिल्ली गए हुए थे। उनके नौकर रणजीत ने बताया कि वे दो-चार दिनों में आ जाएंगे । वह ख़ुद भी बाहर जाने वाला था। मैंने सोचा कि मैं रुक ही जाऊं और उनसे मिल कर फिर चल दूंगी। शमशेरजी आए। पर भयंकर लू लगने से बीमार। फिर तो सारा कार्यक्रम ही उलट-पुलट गया। रणजीत भी चला गया था। मैं वहीं रुकी। इस बीच नरेशजी भी आ गए थे। पीठ का कार्यभार संभालने के लिए। पर शमशेरजी इतने बीमार थे कि उनका जाना संभव नहीं था। जैसा कि मैंने पहले भी लिखा है उनके स्वजनों को मेंने चिट्ठी लिखी कि वे आ कर शमशेरजी को ले जाएं। पर नियति ने कुछ और ही तय कर रखा था। मैंने भी सोचा कि शमशेरजी ने कहा भी था , सो मैं ही उन्हें ले जाती हूँ। फिर ठीक होने पर जैसी उनकी मर्ज़ी।
लेकिन उन दिनो उज्जैन में अपनी तीमारदारी के चलते मैंने काफ़ी अ-प्रियता कमा ली थी। डॉक्टर ने उन्हें पूरा आराम करने के लिए कहा था। पर स्वयं शमशेरजी और उनके मिलने वाले( जो उन्हीं की तरह थे) डॉक्टर की सलाह से बहुत वाक्फियत नहीं रखते थे। मुझे एक कड़ी नर्स का रोल करना पड़ा था। उसी समय यह गुनगुनाहट मैंने सुन ली थी कि 'रंजना ने शमशेरजी पर जैसे कब्ज़ा कर लिया है।' पर आप अगर नर्स हैं तो नर्स हैं। शमशेरजी से जब उनके लोग मिलने(समय-अ-समय) आते थे और मेरी रोक का सामना करते थे, तो वे ही नहीं, शमशेरजी स्वयं भी नाराज़ होते थे। पर बाद में कहते थे कि तुम बहुत अच्छा कर रही हो। मेरी रोक पर शमशेरजी की नाराज़गी तो लोगों ने देखी, पर बाद में जो वे कहते वो तो केवल मैं जानती थी। जंगल में मोर नाचा....। लेकिन मेरे लिए तसल्ली की बात यह थी कि डॉक्टर प्रसन्न थे और शमशेरजी ठीक हो रहे थे। लू से परेशान, अपनी स्थिति का बयान शमशेरजी इस तरह करते थे—'जैसे सिर में सैंकड़ो-सैंकडों चूरे हुए काँच के टुकड़े भरे हुए हों और वे चुभ रहे हों, इस तरह पीड़ा हो रही है।' इंतज़ार करने के बाद जब कहीं से कोई न आया, न ख़त ही मिला तो मैंने शमशेरजी के सामने यह प्रस्ताव रखा कि आप अपना सामान तो वैसे भी मेरे यहाँ रखने वाले थे, तो क्यों न आप अभी मेरे साथ चले चलिए, फिर ठीक होने पर जैसा अपको उचित लगे, कीजिए। शमशेरजी को यह बात जँच गई। पर उन्होंने एक शर्त रखी थी। मैं तुम्हारे साथ तभी आऊंगा जब मकान का किराया मैं दूंगा। मुझे पहले तो हँसी आई। मैंने पूछा इससे फ़र्क क्या पड़ता है। उन्होंने इसका कोई कारण तो नहीं बताया पर अपने आग्रह पर वे अटल रहे। मैंने सोचा यह बात बीच में नहीं आनी चाहिए, अतः मैंने उनकी बात मान ली। फिर जब उस पर मैंने सोचा तो मुझे लगा कि इसका संबंध उनके स्वाभिमान और स्वतंत्रता की भावना से है। वे मेरे घर में नहीं रहना चाहते थे पर अपने घर में मुझे रखना चाहते थे। मुझे यह बात अच्छी भी लगी और समझ भी आ गई क्योंकि मेरे अपने घर में शमशेरजी से कम-से-कम 10-12 वर्ष बड़े दादाजी थे। अतः शमशेरजी की बात मुझे स्वाभाविक भी लगी।
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मैं उस दुर्भाग्यपूर्ण शाम को नहीं भूल सकती जब पहली बार शमशेरजी को डिमेन्शिया का दौरा पड़ा। हम सुरेन्द्रनगर में थे और रोज़ की तरह शाम को टहलने निकले थे। शमशेरजी अभी अपने लू के प्रभाव से नाज़ुक हुई तबीयत से पूरी तरह उबरे नहीं थे। चलते-चलते अचानक उन्होंने कहा अब घर चलना चाहिए। मैंने कहा ठीक है। फिर उन्होंने कहा कि देखो घर जल्दी चलो कितने सारे तोते उड़ रहे हैं। मैंने देखा, एक भी नहीं था। फिर मैं समझी कि मज़ाक़ कर रहे हैं। मैंने पूछा कहाँ हैं। तो उन्होंने कहा देखो सब जगह। मैं थोड़ी घबराई। मैंने पूछा कहाँ। तो ऊपर इशारा किया और चलने लगे। मैंने भी कहा चलिए। पर थोड़ी चिंता हुई। पर चिंता बढ़ी तब, जब हम घर पहुँचे। घर पहुँचे तो उन्होंने कहा चलो घर चलें। मैंने कहा घर तो आ गया है। कहने लगे कि नहीं घर चलो। अब तो मेरे ही मानों तोते उड़ गए। मेरी कुछ समझ में नहीं आया पर इतना मैं जान गई कि कुछ गड़बड़ है। मैने सोचा कुछ देर इंतज़ार ही कर लिया जाय। हो सकता है यह स्थिति देर तक न भी रहे। । थोड़ी देर के बाद उन्होंने रंग और कागज़ माँगा, और कुछ बनाने लगे। मैंने देखा कि उनका हाथ अस्थिर था, रेखाएँ ठीक से बन नहीं रहीं। लिखावट अस्पष्ट-सी। जो बन रहा था वह मेरी समझ से परे था। मैंने पूछा कि क्या बना रहे हैं। कहने लगे तोते.... उड़ रहे हैं। वही बना रहा हूँ। हरी स्केच पेन से बनी वे रेखाएं मानों आने वाले विकट समय का मानों संकेत थीं। अब मेरा दिल बैठ गया। डॉक्टर को बुलाया। उन्होंने कंपोज़ दे कर सुलाया। और कहा कि चिंता न करें, सुबह तक ठीक हो जाएगा । कुछ हो, तो बुला लेना। तब फोन की सुविधा नहीं थी। यहाँ शमशेरजी घर में अकेले। और मैं निपट अकेली। सोचा एक पत्र अशोकजी को लिखूँ, लिखा भी पर पोस्ट नहीं कर सकी। अशोकजी से मेरी कोई आत्मीयता या कोई गहरा परिचय तो था नहीं, पर मुझे इतना पता था कि शमशेरजी को उन पर भरोसा था और वे शमशेरजी का बेहद आदर करते थे।
शमशेरजी स्वस्थ रहें यह मेरी ज़िम्मेदारी थी ; पर उन पर मेरा ऐसा कोई सामाजिक या अन्य अधिकार वाला रिश्ता नहीं था कि मैं जो चाहूँ कर सकूँ- साहित्यिक-समाज के प्रति मेरी एक जवाबदेही भी बनती थी। मुझे याद है वह प्रसंग एक दिन जब सुबह की प्रात-चाल में मैं शमशेरजी के साथ थी। रास्ते में एक बुज़ुर्ग मिले जिन्होंने पैनी दृष्टि से मेरी ओर देखते हुए शमशेर जी से पूछा- ये कौन हैं आपकी। शमशेरजी ने तुरन्त कहा –बान्धवी। बुज़ुर्ग महाशय बान्धवी शब्द के अर्थ की चर्चा देर तक करते रहे। खैर। यही वह संबंध था, जिसे शमशेरजी ने अपने तई तय किया था। पर मैंने तो ऐसा कुछ भी तय नहीं किया था। उनके साथ अपने जुड़ाव को मैं एक ऋणानुबंध मानती रही हूँ जो पूर्व-जन्म के किसी अ-जाने शेष संबंध की पूर्ति था। इसे आप मेरी मान्यता और प्रतीति का सच कह सकते हैं, वैज्ञानिक सच तो यह नहीं ही कहा जा सकता। न ही यह कोई साहित्यिक सच था। पर उस समय इससे कोई फ़र्क तो पड़ता नहीं था क्योंकि तब ज़रूरी यह था कि शमशेरजी को जल्द-से-जल्द स्वस्थ करना है। परन्तु दूसरा दिन तो अधिक चिंता-भरा था शमशेरजी लगभग उसी स्थिति में रहे। वे किसी को पहचान नहीं रहे थे। मेरा नाम भूल गए थे। उन्हें याद नहीं था कि वे कहाँ हैं। न अपने भाई तेजबहादुर का उन्हें कोई स्मरण था, न ही शोभादीदी का। बस अपनी एक भांजी का उन्हें स्मरण था।
क्या करूं क्या न करूं ...सोचने हुए मैं तब पहली बार पोस्ट – आफिस गई और श्री अशोक वाजपेयी जी को फोन किया। अशोकजी तब भोपाल में थे। उन्होंने मध्य-प्रदेश सरकार के माध्यम से गुजरात सरकार से कह कर शमशेरजी के इलाज की उत्तम व्यवस्था करवा दी। तब हमारे यहाँ राज्यपाल डॉ स्वरूप सिंह थे। शमशेरजी की मृत्यु पर राज्यपाल के यहाँ से पुष्पांजलि आई थी, जिससे यहाँ के साहित्यकारों के बड़ा आश्चर्य हुआ था।
यह 1985 की बात है। 1985 से ले कर 1992 तक शमशेरजी की तबीयत ऐसी ही रही- कभी कम कभी ज़ियादा। उन दिनों की बात करना मुझे हमेशा ही कष्टकर लगता है। पर आज भी मुझे सोच कर कई बार हँसी भी आती है कि वे मुझे क्या-क्या नहीं समझते थे। कभी किसी ऐंबेसी में काम करती कोई सेक्रेटरी, कभी नरेन्द्र शर्मा, कभी मिसेस नरवणे ..... वे स्वयं कभी इलाहाबाद, कभी दिल्ली कभी बम्बई होते। उनके साथ जैसी बातचीत होती मैं समझ जाती आज शमशेरजी किस शहर में हैं। कई बार दिनों तक अंग्रेज़ी में बोलते थे, तो कई बार मुझे लगता था कि गोया मैं किसी नाटक के पात्र से बात कर रही हूँ। किसी तीसरे व्यक्ति को इस बात का अहसास तक नहीं हो पाता कि शमशेरजी मानसिक रूप से कब किस शहर में हैं और दूसरे को वे क्या समझ रहे हैं। देश और काल से परे कवि अपने ही वंडर लैंड में मज़े से जी रहे थे। कभी अचानक कहते कि रंजना मैं हिस्ट्री डिपार्टमैंट जा रहा हूँ। मैं पूछती कहाँ है। तो जैसे मैं उनके साथ कोई खेल न कर रही होउँ और उन्होने भाँप लिया हो, इस तरह हँस देते और आगे चल पड़ते। सामने का बंद दरवाजा वे खोल नहीं पाते अतः थोड़ी देर वहीं रुक कर वापस कमरे में चले जाते।
उन दिनों मैं जिस घर में रहती थी वह तीन कमरों का छोटा-सा मक़ान था। उसके चारों ओर बगीचे की खुली जगह थी। मैं घर तो खुला रखती थी पर बगीचे के फाटक पर ताला लगा देती थी। एक दिन दोपहर को कॉलेज से घर आई और बगीचे के दरवाज़े का ताला खोल कर अंदर गई। घर खुला था। अंदर जा कर देखा तो शमशेरजी कहीं नहीं थे । ढूँढते हुए बाहर आई तो देखती हूँ- 'पत्र हीन नग्न गाछ' की मुद्रा में खड़े कुछ सोच रहे थे। मैं हतप्रभ। मेरी समझ में नहीं आया कि क्या कहूँ। मैंने पूछा यहाँ क्या कर रहे हैं। तो मेरी ओर देख कर मुस्कराए और कहा कि सोचता हूँ लायब्रेरी चला जाऊँ। मैं कहने को थी कि आप... पर सोचा कि जो अपने वंडरलैंड में जी रहा है उसे इस दुनिया के रीति-रिवाज़ों से क्या लेना देना। मैंने कहा हाँ, चलिए। फिर उन्हें घर के भीतर ले आई। दरवाज़ा बन्द किया। पर मुझे ईमानदारी से कहना चाहिए कि बाहर से अन्दर आते हुए मैंने आस-पास देख लिया था कि लोग अपने मक़ानों के बाहर तो नहीं हैं। उस दिन के बाद से मैं कॉलेज जाती थी तो घर को ताला लगा कर जाती थी। यह मुझे अच्छा नहीं लगता था अतः एक ऐसे मक़ान की खोज करती रही जो बन्द होने पर भी खुलेपन का अहसास दे और सुरक्षित भी हो। ऐसा घर मुझे मिल भी गया जिसके पिछवाड़े बड़ा सा आँगन था और बरामदा जालियों वाला; ताकि ताला बन्द करने पर भी शमशेरजी को यह प्रतीत न हो कि वे बन्द हैं।
इसके बाद वह समय भी आया कि शमशेरजी लगभग पूरी तरह स्वस्थ हो गए थे। हाँ बुढ़ापा अपने साथ कई तरह की तकलीफ़ें लाया था। फिर डिमेंशिया और पार्किन्सन्स के कारण जो ब्रेन सेल में नुक़सान हो गया था वह तो अपनी जगह था ही। पर मुझे तो याद आता है शमशेरजी का वह बच्चों-का सा हँसना, मज़ाक़ करना और लगातार नई नई भाषाओं को पढ़ने के सपने देखना और योजनाएं बनाना।
सुरेन्द्रनगर के दिनों में कुछ युवा लोगों का एक ग्रुप बन गया था। हम लोग हर गुरुवार को मिल कर शमशेरजी की कविताओं को गाते थे। हमारे एक मित्र मुकेश पंचोली का स्वर बहुत अच्छा था । यों मुकेश चित्रकार थे। इसके पहले वे दुष्यन्त की ग़ज़लें और गुजराती के कवियों की कविताओं को स्वर-बद्ध कर चुके थे। शमशेरजी की भाषा और उर्दू के उच्चारणों की चुनौति स्वीकार करते हुए छोटे से शहर में रहने वाले गुजराती भाषी मुकेश ने कई ग़ज़लें और कविताएं अलग-अलग अंदाज़ मे स्वर-बद्ध की हैं। उस हमारे पूरे मजमें में कई ऐसे लोग भी थे जिन्हें न हिन्दी साहित्य का परिचय था न ही इस बात का पता था कि शमशेरजी का हिन्दी साहित्य में क्या स्थान था और वे यहाँ क्यों हैं आदि। वे तो यही मानते थे कि बापाजी की ग़ज़ल बहुत अच्छी है। उनमें एक टेलीफोन ऑफ़िस का कर्मचारी था जो तंदुरुस्त कद-काठी का था और एक कपास का सामान्य व्यापारी जो बिहारी की नायिका की तरह न दिखने वाला। कपास के इस व्यापारी को बीड़ी पीने का शौक़ था और गाने सुनते हुए तो विशेष। बीड़ी का धुआँ तो दिखता था पर पीने वाला नहीं क्योंकि वह तंदुरस्त कद-काठी के पीछे छिप कर धूम्रपान का आनंद लेते थे। शमशेरजी के लिए यह बड़ी हैरानी की बात थी कि धुँआ तो दिख रहा है, बू भी आ रही है पर उसका स्रोत कहीं दिखाई नहीं दे रहा। वे परेशान हो कर यहाँ-वहाँ देखते पर समझ नहीं पाते। बाक़ी सब शमशेरजी की परेशानी समझते थे और मुस्कुराते भी थे । पर शमशेरजी ने इस बारे में कभी कुछ नहीं पूछा। न उस समय न बाद में कभी मुझे। उनकी समस्या यह नहीं थी कि बीड़ी क्यों पी जा रही है या कौन पी रहा है। पर जो हो रहा है वह उन्हें दिख नहीं रहा है। इन सभी सामान्य लोगों से शमशेरजी बड़ी आत्मीयता और आदर से मिलते थे। एक अर्थ-शास्त्र का विद्यार्थी भी था, मेरी एक सहेली और प्रवीण जो उस समय गुजराती कविता और नाटक के क्षेत्र में सक्रीय थे। नियमित रूप से कई वर्षों तक यह हमारी संगीत-मजलिस चला करती जिसमें शमशेरजी अपनी कविता-गान के प्रथम श्रोता थे क्योंकि बाक़ी सब गाते थे। उन्हें निश्चय ही अच्छा लगता था और इसीलिए वे मुकेश के प्रति उनका विशेष स्नेह था। उस पूरे दौर में मेरी भूमिका यह रहती थी कि मैं इन मजलिसों का सातत्य बनाए रखूं क्योंकि इन क्षणों में शमशेरजी को बड़ा आनंद मिलता था। शमशेरजी की मृत्यु के बाद भी कई वर्षों तक उनकी स्मृति में हर 13 जनवरी को हम मिल कर उन्हे गाते रहे। इन्हीं में मेरी माँ भी शामिल रहती, जब कभी वे मुझसे मिलने सुरेन्द्रनगर आतीं। शमशेरजी इस पूरी प्रकिया में हर व्यक्ति की विशेषताएं भी पहचान लेते थे। और हर व्यक्ति से उसी तरह बात भी करते। मुकेश से बात करने का उनका भाव जहाँ सम्मान से भरपूर था वहीं प्रवीण से बात करते थे तो लगातार उनके भीतर के नाटककार को चुनौति देते हुए और हवा से ज़मीन पर लाने की कोशिश करते हुए। असल में आने वाले संभवित ख़तरों से बचाने की कोशिश करते हुए, जिसको प्रवीण उस समय शायद न पहचान पाए हों पर बाद में उसकी व्यंजना और महत्व समझ गए।
मैं उस शहर में थी तब अविवाहित थी। अतः ऐसे कई लोग मुझसे मिलने आते थे जो बड़ी शराफ़त से टाईम-पास करने की कोशिश करते थे। मैं परेशान भी रहती थी। एक बार मैंने शमशेरजी से इस विषय में कहा। शमशेरजी चाहे बीमार और अस्वस्थ थे पर जैसे मेरी सुरक्षा की ज़िम्मेदारी उनकी हो इस तरह वे उन लोगों से निपटते भी थे। एक बार देर रात को दो सज्जन मेरे घर आए। वे बैठे ही थे कि शमशेरजी अपने कमरे से बाहर आए और कहा- बहुत देर हो गई है , अब सोने का वक्त हो गया है। आप फिर कभी आएँ। उसके बाद इस संकट का मुझे सामना नहीं करना पड़ा।
शाम के समय अकेलेपन का अहसास शायद सबसे तीव्र होता होगा, इस बात को मैं शमशेरजी के साथ रहते हुए समझ सकी थी। उनका किसी बात का कोई आग्रह नहीं रहता था पर जैसे निवेदन के स्वर में वे कहते थे कि रंजना तुम शाम को कहीं जाया मत करो। एक बार मैंने कारण पूछा तो बड़े अनमने स्वर में कहा एक अजब किस्म की घबराहट होती है।
दिवाली और गर्मियों की छुट्टियों में हम प्रायः बडौदा चले जाते थे। अतः पूरे घर को व्यवस्थित कर के, बन्द करना एक बड़ा काम होता था। उस घर में बहुत खिडकियां थीं और एकाध भी खुली रह जाती तो कबूतरों की वंश-परम्परा का आरंभ हो जाता था। अतः एक बार मैंने यह आग्रह किया कि कबूतरों को उड़ा कर खिड़कियां पूरी तरह बंद कर दूं। शमशेरजी ने ठीक है..... पर अभी इस घोसलें में बच्चे हैं। उन्हें बड़ा हो कर उड जाने दो। मैंने कहा कि इनके उड़ने से पहले तो दूसरे अंडे तैयार होंगे। हाँ, यह तो है। पर खिड़कियां बन्द करने पर इन्हें दाना कौन डालेगा। मैंने तर्क तो किया पर अचानक मुझे ध्यान आया कि मैं एक कवि के साथ हूँ। कई बार ऐसा होता है कि आप व्यवस्था में इतने मुस्तैद हो जाते हैं कि जिन बातों का महत्व है उन्हीं का विस्मरण हो जाता है। मेरी चिंता घर गंदा होने की थी और उनकी चिंता कबूतरों के बच्चों की जान को ले कर थी। शमशेरजी के साथ होने का मतलब केवल धूप चिड़िया की बात करना नहीं पर उनकी संवेदना को व्यावहारिक स्तर पर खरा भी होते हुए देखना था, इस बात को मुझे समझना बाक़ी था। उसके बाद मैंने ऐसी कोशिश नहीं की।
शमशेरजी से मिलने हिन्दी के कई अनाम और नामी गिरामी लोग सुरेन्द्रनगर आए। ख़त आता और मैं कहती शमशेरजी फलाँ आ रहे हैं। ऐसे ही एक बार एक ख़त आया और शमशेरजी ने कहा रंजना किताबें ताले में रख दो और ज़रा देख लेना कि मेरी पांडुलिपियाँ कहीं बाहर तो नहीं हैं। मैं चौंकी। फिर उन्होने मुझे एक क़िस्सा सुनाया कि कैसे एक प्रतिष्ठित साहित्यकार उनके घर आए थे। वे ग़ुसलख़ाने में थे। उनके बाहर आने तक तो वे सज्जन जाने की तैयारी कर चुके थे। ग़ुसलख़ाने से निकलने के बाद उन्होंने देखा कि उक्त सज्जन अपने कुर्ते के भीतर कुछ छिपा कर ले जा रहे हैं। वे इस मुग़ालते में थे कि शमशेरजी की नज़रें तो कमज़ोर हैं, उन्हें पता नहीं चलेगा। फिर शमशेरजी ने पड़ताल की तो पता चला कि किसी उर्दू कवि की पांडुलिपि जो शमशेरजी को देखने के लिए दी गई थी वह नदारद थी। बड़े नामों के छोटे कामों से मेरा परिचय यूं हो रहा था।
एक बार अज्ञेयजी का पत्र मेरे नाम आया । वत्सल निधि की ओर से उन्हें वे कुछ आर्थिक मदद करना चाहते थे। शमशेरजी की रुचि अज्ञेयजी से मिलने की थी। पर अफ़सोस, वह दिन नहीं आ सका क्योंकि जिस दिन अज्ञेयजी आने वाले थे, उसके कुछ दो-चार दिन पहले ही उनका अवसान हो गया। बाद में इलाजी आईं थीं। अज्ञेयजी के प्रति शमशेरजी के मन में बड़ा आदर था। इस बात को वे लिख भी चुके हैं। मुझे तो इन तमाम वर्षों में एक बात बड़ी विलक्षण लगी कि ताले वाले प्रसंग और एकाध कोई और प्रसंग होगा कि शमशेरजी ने ऐसी बात कही होगी । पर मैंने उन्हें किसी की भी निंदा करते हुए नहीं सुना। यह आश्चर्य की ही बात है क्योंकि चौबीस घंटो कोई साथ हो और निंदा रस का अभाव हो- यह अविश्वसनीय बात ही है।
उन्होंने अपने शेष जीवन का प्रोग्राम बना रखा था कि कौन-कौन सी किताबें पढ़नी हैं। हम लोगों ने सूरसागर, रामचरित मानस आदि का संयुक्त वाचन किया था। शेक्सपीयर–समग्र का जो एडिशन मेरे पास था वह दूसरी बार बाईंड किया हुआ था। एक दिन देखती हूँ शमशेरजी पन्ने अलग कर कर के पढ़ रहे हैं। मुझे देखते ही कहने लगे ऐसे पढ़ने में बड़ी सुविधा है। किताबों में ऐसी ज़िल्द होनी चाहिए कि आप मोड़ कर भी बड़े आराम से पढ़ सकें। ऐसी एक किताब उनके पास थी भी। पकड़े जाने पर शैतानी करता हुआ बच्चा जिस तरह की सफ़ाई देता है कुछ वैसी मुद्रा शमशेरजी की अक्सर हो जाती। एक बार जब वे उज्जैन में थे और मैं मिलने गई थी तो कहने लगे कि तुम्हें पता है यह मेरा संस्कृत हिन्दी शब्द कोश पुकार पुकार कर कह रहा था कि मुझे रंजना के यहाँ जाना है। अच्छा हुआ तुम आ गईं। तुम ले जाना। एक बहुमूल्य पुस्तक की प्राप्ति की अपेक्षा उसे मुझे देने का उनका अंदाज़ इतना विलक्षण और अमूल्य लगता है कि मेरे पास कोई शब्द नहीं कि मैं बयान कर सकूं। ग़ालिब की ग़ज़लें और ऋग्वेद की ऋचाएं उनके नियमित पाठ का हिस्सा थे। अंत तक इन दो पुस्तकों को तो वे पढ़ते ही थे। ऋग्वेद पढ़ना आस्था का आदर करना, मार्क्सवाद के नियमों में आता है या नहीं , मैं नहीं जानती पर जो सच है वह तो यही कि शमशेरजी ने अपने जीवन के अंतिम क्षणों में केवल और केवल गायत्री मंत्र सुनना और बुदबुदाते हुए उसका पाठ करना चुना था। उनकी डायरियों में भी इन मंत्रों को समझने की कोशिशें दिखाई देती हैं। असल में शमशेरजी ऋग्वेद को भी एक कलाकार की दृष्टि से ही समझना और पढ़ना चाहते थे, पढ़ते भी थे।
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शमशेरजी को खिलाने का शौक़ तो था ही पर अच्छी चीज़ें खाने का भी शौक़ था। मिठाई, हलुआ, रबड़ी, जलेबी फल (ख़ास तौर पर आम और फिर पपीता और केले) दूध, शहद, हल्दी... इन सब का सेवन वे बड़े मज़े से करते। शहद वे इस तरह खाते कि शहद की बोतल को मुँह से लगा लेते। अपनी प्रिय वस्तुओं के सेवन के बाद उनके चेहरे पर जो आनंद और संतोष मैंने देखा है , इन भावों का इतना निर्मल स्वरूप मैंने कम लोगों में देखा है। हलुआ तो उन्हें इतना प्रिय था कि अगर वे सो रहे होते तो हलुए की ख़ुशबू जैसे उनकी नींद में चली जाती और वे उठ जाते। एक बार इसी तरह हम सहेलियाँ जाग कर काम कर रही थीं । रात को भूख लगी सो सोचा हलुआ बनाएँ। शमशेरजी तो सो रहे थे, हम यह सोच रही थीं कि अगर जागते होते तो अवश्य ही ख़ुश होते। थोड़ी देर में देखते हैं कि शमशेरजी कमरे के दरवाज़े पर खड़े हैं और बड़े भोलेपन से कह रहे हैं कि मुझे सपने में हलुए की खुशबू आई और मैं जाग गया। हम जी भर कर हँसे।
शमशेरजी की आम-प्रीति तो आज भी हमारे घर में याद की जाती है। प्रत्येक गर्मियों में शमशेरजी को याद करते हुए आम खाना हमारे घर की आदत में शामिल हो गया है। अच्छे भोजन की तरह उत्सवों और ऋतुओं के प्रति शमशेरजी के मन में हमेशा उत्साह रहता था। उनके चेहरे पर उत्सव का आनंद दिखाई पड़ता था। चाहे होली हो, दिवाली हो या ईद। होली पर रंगों में रंग जाना उन्हें प्रिय था। वे टेसू के फूलों के रंग से अपने को और दूसरों को बड़े प्यार से रँगते थे। दिवाली पर रँगोली बनाना और दिए के शीतल प्रकाश में आत्मस्थ होने के दृश्य मुझे भूलते नहीं। हम लोगों में दिवाली उस तरह नहीं मनती जैसे उत्तर प्रदेश में। पड़वे के दिन घर के पुरुषों को सुबह तेल की मालिश करना फिर उबटन से नहलाना...यह हमारे घर की परंपरा है। शमशेरजी जिन वर्षों में साथ थे और जिस दिवाली पर हम सब साथ होते तो माँ, बहन, भाभी और मैं.... हम सभी उन्हें तेल की मालिश करते। वे इस रिवाज़ में भी उतना ही आनंद लेते और कहते यह तो बहुत अच्छा रिवाज़ है। सभी जगह ऐसा ही रिवाज़ होना चाहिए। संभवतः इसका कारण यह होगा कि वे स्वयं मालिश प्रेमी थे। उनकी बनाई रंगोली मेरी स्मृति के साथ-साथ एक तस्वीर में भी क़ैद कर रखी है मैंने। वर्षा और वसंत शमशेरजी की प्रिय ऋतुएं थीं। मुझे लगता है वसंत ऋतु में पीले कपड़े खरीद कर पहनने की आदत मुझे शमशेरजी के साथ रहते हुए ही पड़ी है। मुझे ही क्यों, आज भी मेरी माँ और बहन मुझे पूछती हैं हर वसंत पंचमी पर कि इस बार क्या खरीदा।
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दस वर्ष कम नहीं होते किसी के साथ रहते हुए, विशेष कर जो वर्ष आपके जीवन के सबसे अहम् वर्ष हों। मझे ख़ुशी इस बात की है कि इन वर्षों में मैंने जीवन और जगत के विभिन्न रूप देखे और उन्हें समझने का तरीक़ा भी सीखा। इन वर्षों में शमशेरजी के साथ रहते हुए मेरे भीतर का स्पेस उनकी उपस्थिति से कितनी दूर तक भर गया था उसका अहसास मुझे तब हुआ जब 12 मई 1993 की शाम को शमशेरजी इस दुनिया से विदा ले कर दूसरी दुनिया की राह पर चल पड़े थे और हम शेष लोग घर लौट आए थे। आज मई की शाम अकेली.... मेरे भीतर के उस खालीपन और अकेलेपन को अपने अलावा मेरे दादाजी की आँखों में झांकता हुआ भी मैंने देखा था। इन वर्षों में अगर शमशेरजी अपना जीवन सुख से बिता पाये थे तो उसके लिए वे ख़ुद ज़िम्मेदार थे। उनकी ज़िन्दादिली और जीवट ही उन्हें सुख से जिला रहे थे, जिसको बनाए रखने में मुझे मेरे परिवार का सहयोग मिला और उनकी अगर तीमारदारी मुझसे हो सकी तो इसके लिए अपने परिवार के अलावा मित्रों का साथ मुझे हमेशा याद रहेगा। शमशेरजी ने एक बार मुझसे कहा था कि माँ की मृत्यु के बाद परिवार का सुख मुझे यहीं तुम्हारे परिवार में मिला है। उनके इस भाव के लिए हमारा परिवार हमेशा ही अपने को सौभाग्यशाली मानता है।
शमशेरजी की कई तरह की यादें मेरे भीतर सोई पड़ी हैं...पर आज के लिए बस इतना ही।
धन्यवाद।