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शनिवार, 26 जनवरी 2013


मिथक की पुनःसर्जना का मनोविज्ञान
महाभारत की असीम संभावनाएं- भाषा शिल्प में मिथकीय अभिव्यंजना के नवीन अभिगम
क्या कौरवों पाँडवों का समय सचमुच  समाप्त हो गया है ?[i]   क्या समुद्र मंथन के समय धोखे से अमृत पीने वाले राहू - केतु तथा असुरों को अमृत न देने की अनीति करने वाले देव, अब, इस हमारे आज के समय में नहीं हैं ? बसों में, बड़े-बड़े आलीशान मक़ानों में अथवा तो फार्म-हाऊसेस में तबदील होती कुरु-सभाओं में द्रौपदियाँ बलात्कृत हो रही हैं.... क्या कौरव पाँडवों का समय सचमुच समाप्त हो गया है !?!  एक साझे-सम्मिलित भारतीय समाज के रूप में  आज से पूर्व  कभी भी, या आज वर्तमान में भी, क्या कोई व्यक्ति महाभारत अथवा रामायण के कथा -संदर्भों से अपने को, अपने जीवन को  पूरी तरह से अलग कर सका है ? ये कथाएं और इनके संदर्भ आज भी प्रीतिकर रूप में अथवा तो भयावह रूप में भी, भारतीय जन-मानस के जीवन का अभिन्न हिस्सा हैं। इन कृतियों के रचनाकाल को ले कर विद्वानों  में मतभेद हो सकता है, इन ग्रंथो के चरित्रों को चाहे तो कोई कल्पना-प्रसूत ही कह ले अथवा कपोल-कल्पित ही क्यों न मान लें ; जनमानस की हृदय-चेतना में रामायण तथा महाभारत की कथाएं एवं संदर्भ गहराई से अंकित हैं। यह मान लेने की कतई आवश्यक भी नहीं, कि इन ग्रंथों को जनता ने पढ़ा होगा। यह ज्ञान तो परंपरा से उतर आया है , उतरता चला आ रहा है आज तक। इनके घटित होने के विषय में भारतीय जन-मानस एक प्रतिशत भी संदेह नहीं करता। हमारा रोज़-ब-रोज़ का सामान्य जीवन और व्यवहार महाभारत तथा रामायण के विभिन्न संदर्भों से युक्त ही रहता है। ये दोनों कृतियाँ चालू वर्तमान काल (Present continuous) में जन-मानस के हृदय में विद्यमान रहती हैं।  आज तक भारतीय काव्य- कथाओं में , उपन्यास- नाटकों में,  अथवा तो  फिल्मों की कथाओं में; क्या महाभारत और रामायण के निहितार्थों से उनको अलगा पाना संभव हुआ  हैं?  भारतीय पारिवारक संबंध, नायक नायिका से अपेक्षाएं क्या वास्तव में बदल गयी हैं? आज भी लक्ष्मण रेखा पार करनेवालियों की खैर नहीं  समझी जाती। आज भी, भाषा में सुरक्षित तथा प्रयुक्त यह प्रयोग दहला देता है। मानों हम अचानक एक मिथिकल समय में जीने लगते हैं।
इसी बिन्दु पर आकर यह विचार करना आवश्यक हो जाता है कि मिथकों के संदर्भ में अब तक प्रायः पाश्चात्य नज़रिये से ही सोचा गया है। भारतीय संदर्भ में मिथ संबंधी विचारणा की क्या स्थिति है इस पर डॉ. नगेन्द्र के मंतव्य को ध्यान में लिया जा सकता है।(डॉ. नगेन्द्र की पुस्तक से उद्धरण लेना है।) सीधी सी बात यह है कि भारतीय मानस के लिए मिथक कोई बीती हुई घटना नहीं है। लेकिन क्या मिथक की संकल्पना के संबंध में भरतीय दृष्टिकोण की संभावना पर विचार करना आवश्यक हो गया है? और क्यों? या फिर यह एक निरा वैचारिक पिष्टपेषण ही होगा? एडवर्ड सईद के बाद अब यह एक साहित्यिक प्रचलन तो नहीं हो गया है कि हर मुद्दे पर एक भारतीय(ओरियंटल) सोच का होना अथवा विकसित किया जाना आवश्यक माना जाए?  निश्चय ही इसे एक संकीर्ण राष्ट्रीयतावादी सोच कहा जा सकता है अथवा प्रतिगामी/ प्रतिक्रियावादी कह कर एक तरफ़ डाल दिया जा सकता है, किन्तु ऐसा करने से मिथ संबंधी भारतीय वस्तुस्थिति का जायज़ा नहीं लिया जा सकता । पश्चिम में  मिथक कहने पर एक पुरातन विस्मृत काल का संदर्भ ध्यान में आता है। भारतीय जन मानस तथा समाज का जहाँ तक प्रश्न है, लोगों के नाम, दुकानों के नाम, घरों के नाम तथा जीवन के विविध व्यापारों के संबंध में मिथकीय संदर्भों की भरमार यहाँ पर देखी जा सकती है। यह हमारी आज की वर्तमान प्रयुक्त भाषा का हिस्सा है। इसका एक कारण भारतीय संस्कृति का सातत्य भी हो सकता है। वैदिक काल से आज तक भारतीय संस्कृति की अस्खलित उपस्थिति देखी जा सकती है। इसीलिए यज्ञ जैसा अनुष्ठान भी तब से लेकर आज तक चला आ रहा है। इस अनुष्ठान को पिछड़ा तथा प्रतिगामी बताने के लिए पश्चिमी मानसिकता की कोई आवश्यकता नहीं है क्योंकि भारतीय इतिहास में जैन तथा बौद्ध धर्म पहले यह कर चुका है। आधुनिक काल में भी उस पर व्यंग्य करते हुए  भारतेन्दु भी अपनी वैदिकी हिंसा हिंसा न भवती के साथ मौजूद हैं। भारतीय संस्कृति की इतनी दीर्घकालीन सातत्यपूर्ण उपस्थिति ने मिथकों को कभी भी भूतकाल नहीं बनने दिया है। अगर भारतीय भूगोल के किसी भी हिस्से में सीता तथा भीम की रसोई बताई जाएगी तो इसे मान लेने में कोई आपत्ति नहीं होती है। इसी तरह हाल ही में हुआ राम- सेतु का विवाद इसका बहुत बड़ा उदाहरण है। राम- सेतु के होने अथवा न होने के विवाद के पीछे यही दो मुख्य बिन्दु तो थे- एक वह वर्ग जो हमारी सांस्कृतिक एवं सामाजिक भी, सातत्य पूर्ण उपस्थिति को स्वीकार करता है तथा एक वह वर्ग जो उसका अस्वीकार कर के इस सातत्य को तोड़ने का षड्यंत्र करना चाहता है। "अपने अपने राम" लिख कर भगवान सिंह ने चाहे राम का मिथक तोड़ने का प्रयास किया हो  परन्तु उनके शोध पूर्ण उपन्यास से यह अवश्य ज्ञात होता है कि उस समय लंका तथा अयोध्या के बीच व्यापार संबंध थे। यानी मिथकों का काल इसके पूर्व का है। मिथक असल में हमारी पहचान को और अधिक गहरे रोपने का काम करते हैं। यही बात एशिया की अन्य संस्कृतियों के संदर्भ में भी कही जा सकती है। चीन तथा जापान के देशों की संस्कृति के इसी सातत्य को आज भी उनकी फिल्मों के माध्यम से बड़े गौरव पूर्ण ढंग से प्रदर्शित होता देखा जा सकता है। ऐसी कोई भी फिल्म, जिसका अगर नायक चीनी अथवा जापानी है, तो वह अपने धर्म अथवा किसी परंपरा के चिह्न की रक्षा के लिए अपनी परम्परागत युद्ध पद्धति से प्रयत्नशील दिखाई पड़ता है।
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सेमिनार के इस अंतिम सत्र में मिथक की पुनःसर्जना के मनोविज्ञान पर चर्चा अपेक्षित है।  महाभारत की ज़मीन असीम संभावनाओं से भरी है। अतः युगानुरूप इसमें भाषा शिल्प[ii] की मिथकीय अभिव्यंजना के नवीन अभिगम देखे जा सकते हैं। पर फिर भी कुछ ऐसे मुद्दे हैं जिन पर चर्चा करना अनिवार्य है, मसलन

Ø  साहित्य और मिथक का क्या अन्तर्संबंध है? 
Ø  उत्तर-आधुनिक समय में  मिथ का क्या महत्व है ?
Ø  मिथ साहित्य स्वप्न तथा भाषा काल एवं समय के संदर्भ में किस तरह भिन्न हैं, संरचना की दृष्टि से इनमें क्या समानता है ।
Ø  नयी टेक्नोलॉजी ने मिथकों की अभिव्यक्ति में ऐसा क्या कर दिया है कि मिथक अर्थ एवं अभिव्यंजना-दोनों ही स्तर पर नयापन ला देते हैं।
मिथक तथा साहित्य का संबंध सबसे पहले उसकी स्वरूपगत संरचना की समानता में देखा जा सकता है। मिथक का संबंध केवल और केवल साहित्य से नहीं है। उसका संबंध धर्म, कर्मकांड, दर्शन से भी है।  किन्तु साहित्य के विद्यार्थियों को, वह,  यानी मिथक, साहित्य से अभिन्न लगता है।  महाभारत मुख्यतः साहित्य-कृति है।  परन्तु अगर यह कहा जाए कि महाभारत अपने आप में एक मिथक है तो आश्चर्य नहीं होना चाहिए।  मिथक और महाभारत  - दोनों की संरचना में समानता है। मिथक का स्वरूप कथात्मक अथवा कथा-संकुल (Preminger) के रूप में होता है, उसमें अतियथार्थ का तत्व होता है,, वह कहीं न कहीं अनुष्ठानों से संबंधित है, वह असंभव को कल्पित करता है, उसमें जन्म मरण से जुड़े विचित्र तत्व होते हैं। (डॉ.नगेन्द्र) 
महाभारत क्या है? वह एक महा-कथा है और उसमें कितनी सारी अन्य कथाएं तथा उप-कथआएं हैं । अनेक कथा संकुल हैं - जिसमें- पुरुररवा की कथा, शकुन्तला की कथा, सावित्रि की कथा ...हैं।  प्रकृति और मनुष्य के परस्पर संबंध हैं- जैसे गंगा और भीष्म के जन्म-मरण के अविश्वसनीय, अतिलौकिक संदर्भ इसमें हैं- जैसे याज्ञसेनी और पाँडवों कौरवों के जन्म संदर्भ। पर एक ही अन्तर है जो महाभारत को साहित्य बनाता है- और वह है महर्षि वेदव्यास द्वारा उसका रचा जाना। मिथकों के रचयिता अनाम होते हैं। इसका अर्थ यह है कि इन रचनाओं के रचे जाने के पूर्व इनमें निहत मिथक रचे जा चुके थे जिन्हें महाभारत में वेदव्यास पुनर्निर्मित करते हैं। मिथक की पुनः सर्जना होती है। मिथक तो प्रायः मानव संस्कृति के ऊषः काल से उद्भवित माने गए हैं (पटेल) और यह अतीत हमारे समय-बोध की पकड़ से बाहर होता है। (पटेल) मिथक कालातीत होते हैं और इसलिए प्रत्येक युग के साहित्य को आकर्षित करते हैं। मिथक में नूतन दृष्टिकोण की अनेक संभावनाएं होती हैं। प्रत्येक युग का जाग्रत दृष्टा कवि उसमें युगानुरूप संभावनाएं देखता है। यहीं आकर यह बात स्पष्ट होती है कि साहित्य और मिथक परस्पर संबद्ध है।
मनुष्य का विश्व अत्यन्त जटिल है। उसके चारों ओर रहे जगत की तुलना में उसका विश्व जटिल इसलिए है क्योंकि उसने अभिव्यक्ति एवं जीवन-यापन के लिए (प्राणियों की तुलना में) नयी तकनीकों का इजाद किया है। एक क्षण के लिए अगर मान लिया जाए कि ईश्वर है तो यह संसार उसी का प्राकट्य(manifestation) है- ऐसा माना जा सकता है। यानी ईश्वर की कल्पना करना ही एक प्रकार से मिथक की सर्जना करना है। जब तक ईश्वर की कल्पना नहीं थी, नदी, पर्वत, पेड़ आदि अपने अभिधात्मक रूप में ही पहचाने जाते थे; जैसे ही ईश्वर की कल्पना की गयी, ये प्राकृतिक तत्व अभिधात्मक न रह कर लक्षणा एवं व्यंजना प्रधान हो जाते हैं।  इतना ही नहीं ये प्राकृतिक तत्व, मिथकीय प्रतीकात्मकता से युक्त भी हो जाते हैं। मिथकीय प्रतीक एक प्रकार की भाषा होते हैं, क्योंकि ये किसी-न-किसी अर्थ को संप्रेषित करते हैं। भाषा का काम भी मुख्यतः संप्रेषण करना ही है और मिथकीय प्रतीक भी किसी न किसी प्रकार का संप्रषण ही करते हैं। इसका अर्थ यह हुआ कि संप्रेषण के स्तर पर मिथक और भाषा एक ही प्रकार का काम करते हैं। मिथक मनुष्य जाति के स्वप्नों, उम्मीदों एवं आकांक्षाओं का संप्रेषण करते हैं। उनकी अभिव्यक्ति प्रतीकों अथवा कथाओं- कथा-संकुलों द्वारा होती है। जैसे नवरात्रि के जवारे प्रजनन का प्रतीक हैं (धार्मिक अनुष्ठान)   संपाति असंभव उड़ानों का प्रतीक है (प्रकृति), उर्वशी असीम सौन्दर्य का प्रतीक है (मनुष्य की तीव्र लालासा)। विचार एवं भाव का संप्रेषण साहित्य में भाषा के माध्यम से होता है। मिथक की रचना आदिम समय में इतिहास-पूर्व के किसी समय में  होती है , उसका टाईम-स्पेस (देश-काल) अनिश्चित होता है और वह किसी भी समय में अपना रूप और तात्पर्य बदल कर अर्थ देने की क्षमता रखते  हैं। साहित्य की रचना का काल निश्चित होता है और वह ऐतिहासिक अथवा चैतसिक काल एवं भौगोलिक देश में घटित होता है।  किस तरह बदलते समय के साथ मिथक कथाओं की अभिव्यक्ति बदली है, यह चर्चा का विषय हो सकता है।
असल में मिथक और साहित्य का संबंध बड़ा गहरा है। साहित्य में मिथक कथाएं या तो पुनर्निर्मित होती हैं अथवा मिथक अलंकार रूप आते हैं, या फिर युगबोध को प्रकट करते हैं अथवा  तो कभी भाव के प्रतीक रूप में आते हैं।  जिस तरह मिथ में आकार और अर्थ दोनों होते हैं उसी तरह साहित्य में आकार और अर्थ दोनों होते हैं। नवरात्रि में उगाए जाते जवारे में आकार तो है ही पर उसमें प्रजनन का अर्थ निहित है। स्त्री शक्ति का अर्थ निहित है। डॉ नगेन्द्र (नगेन्द्र) ने साहित्य के स्वरूप की संरचना को यज्ञ के साथ जोड़ा है। नाटक के आकार को यज्ञ प्रक्रिया के अनुरूप बता कर साहित्य स्वरूप को मिथक के समकक्ष बताया है। पश्चिम में ट्रेजेडी(साहित्य स्वरूप) को भी धार्मिक अनुष्ठान के साथ जोड़ कर देखा गया है। अर्थात् सिथक एवं साहित्य स्वरूपों की संरचना में समानता को देखना साहित्य को मिथक तथा मिथक को साहित्य के समकक्ष रखता है।

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ऊधो मन रे नहीं दस-बीस
एक हुतो सो गयो स्याम संग, को आराधै ईस
गोपियाँ उद्धव से जब उक्त निवेदन करती हैं तो उनका वास्तविक इरादा संभवतः कुछ और रहा होगा, पर उसका मुख्य अर्थ यह निकाला जा सकता है कि मन एक ही है और वह कृष्ण के प्रति समर्पित है। पर यह कहना कि मन रे नहीं दस –बीस  इस संभावना को भी प्रस्तुत करता है कि मन एक से अधिक यानी दस –बीस होने की संभावना बनी हुई है। और मन इसलिए दस बीस हो सकते हैं क्योंकि हमारे यहाँ चतुरानन, दशानन, चतुर्भुज, अष्टभुज अथवा त्रिनेत्र की भी परिकल्पना है। सामान्य बातचीत में यह कहते सुना गया है कि आखिर दो ही हाथ हैं मेरे..। अर्थात् शारीरिक मर्यादा इंगित है। मन अगर अधिक होते तो और क्या किया जा सकता था? इसीलिए अपने देवी देवताओं में चतुर्भुज और चतुर्मुख की कल्पना करते हैं। मनुष्य जीवन के अभावों के परिप्रेक्ष्य में जो कल्पना करता है,- अभावों की वही पूर्ति  मिथक कथाओं तथा कल्पनाओं के रूप में जन्म लेती हैं। यह सोचने की बात है कि मनुष्य अगर अपने  सामान्य शरीर की तुलना में अधिक अंगों-उपांगों से जन्म ले- मसलन वह चतुर्मुखी या त्रिनेत्र हो तो वह कौतुहल का विषय होता है। उसे असामान्य माना जाएगा, उसके प्रति न सम्मान का भाव होगा न ही प्रेम का, पर एक प्रकार की एपेथी या निचले स्तर की कुतुहल-वृत्ति का भी भाव रहेगा। मनुष्य के जिस स्वरूप को उसकी मिथकीय उपस्थिति में खुले दिल से स्वीकारा जाता है, उसे वास्तविक जीवन में आशंका भय अथवा अविश्वास के साथ ही देखा जाता है। चार हाथों वाला शिशु अथवा मनुष्येतर मुख से जन्मा शिशु क्या गजानन अथवा अष्टभुजा की तरह स्वीकार्य होगा? उसके सामाजिक जीवन का भविष्य उसकी स्वरूपगत असामान्यता में बाधक बनता है। उसकी न शादी होगी न ही उसे कोई नौकरी देगा। इसका एक अर्थ यह होता है कि एक तरफ़ मिथकों का मनुष्य के वास्तविक जीवन में कोई सीधा स्वीकार नहीं है पर फिर भी वह नित्य प्रति मनुष्य के वास्तविक जीवन का एक हिस्सा भी हैं। चतुर्भुज अथवा चतुरानन ईश्वरों को वास्तविक मानने में एक प्रतिशत भी संदेह नहीं होता। संभाव्यता के कारण और लौकिक वास्तविकता से भिन्न होने के कारण उसे सत्य मानने में कोई आपत्ति नहीं होती। इसी संभाव्यता को अरस्तू ट्रेजेडी के केन्द्र में देखता है। यही संभाव्यता साहित्य भी रचती है और यही संभाव्यता मिथक भी रचती है। अर्थात् है  और था  के बीच है संभाव्यता- ऐसा हो सकता है- और इसी संभाव्यता का ही दूसरा नाम साहित्य है और मिथक भी इसी संभाव्यता से जन्म लेता है। इसका अर्थ हुआ कि यथार्थ अथवा वास्तविक न होते हुए भी यथार्थ होने की प्रतीति का नाम साहित्य है, मिथक है।
साहित्य के क्षेत्र में मिथक-चर्चा का प्रवेश '60 के दशक में हुआ। नॉर्थरोप फ्राय की पुस्तक फेबल्स ऑफ आइडेंटिटि (Frye)- जो इस संदर्भ में अत्यंत प्राथमिक ग्रंथ माना गया है, सन् 63 में प्रकाशित हुआ। यानी उत्तर-आधुनिकता का आरंभ तथा आधुनिकता के अन्तिम चरण पर मिथकीय काव्य-दृष्टि एवं आलोचना का उद्भव होता है। आधुनिकता की निश्चितता, व्यक्ति-अस्मिता एवं शाश्वतता से ठीक विपरीत उत्तर-आधुनिकता अनिश्चितता, (अनेकान्तता) समूह की पहचान एवं परिवर्तनशीलता की बात करता है। आधुनिकता जहाँ कला आंदोलनों की उर्वरा भूमि रही है वहाँ उत्तर आधुनिक समय में साहित्य तमाम ज्ञान के क्षेत्र एवं विषयों से घिरा, अन्तर्विद्याकीय प्रमुखता का रहा है। मिथक आधुनिकता एवं उत्तर-आधुनिकता के बीच इस तरह अवस्थित है कि उसके पाँव आधुनिकता की ज़मीन पर पंजों के बल पर टिके हैं और नज़र भविष्य पर टिकी है। इस उत्तर-आधुनिकता के दौर में मिथक का यही महत्व है कि वह स्त्री मिथकों के नए संदर्भों को उजागर करता है।  साथ ही एक प्रश्न भी खड़ा करती है कि अगर मिथ का संबंध कहीं- न- कहीं हमारी पहचान से जुड़ा है तो दलित, आदिवासियों के मिथ की खोज इस समय का सबसे महत्वपूर्ण मुद्दा होना चाहिए; क्यों कि मिथ के मूल में जो कुछ भी है- धर्म, अनुष्ठान, अतिकल्पना सभी कुछ दलित जीवन में भी होनी चाहिए। आदिवासी जीवन की तो भूमि ही प्रकृति है अतः ऋतु-चक्र, ऊषा रात्रि जन्म-मरण के अनुष्ठान वहाँ भी मौजूद हैं। राजनीतिक आधार विमर्शों को अस्थायी आधार दे सकते हैं, परन्तु मिथक पहचान देते हैं, सामूहिक आकांक्षाओं को रूप देते हैं। इसमें कोई संदेह नहीं कि राजनीतिक संदर्भ(अधिकार) अथवा दबाव अथवा समय की माँग दलित एवं नारी साहित्य अथवा अन्य प्रकार के हाशिए के साहित्य के अस्तित्व के लिए जितने कालजयी साबित नहीं होंगे, उतने इनके मिथक होंगे।
मिथक तथा टेक्नॉलॉजी के संबंध की चर्चा इसलिए रोचक हो सकती है क्योंकि हमारे सामने एक तरफ़ मैट्रिक्स, एवेटार, कोई मिल गया एवं कृष जैसी फिल्में हैं तो दूसरी  तरफ़  काफ्का के मेटामॉरफोसिस की ट्रेजेडी को टेक्नॉलॉजी के कारण मक्खी जैसी रोमैंटिक कॉमेडी मे बदलते हुए देखा जा सकता है। रूप परिवर्तन करना भी मनुष्य की अदम्य इच्छा का एक उदाहरण है।  सिनेमा का माध्यम और सिनेमा की भाषा में यह रूप परिवर्तन का काम जब संभव होता है तो इसके कई तरह के परिणाम आ सकते हैं। इसके मूल में भावातिरेक, (प्रेम अथवा क्रोध), राजनीति अथवा असुरक्षा आदि को देखा जा सकता है। महाभारत में इसके उदाहरण देखे जा सकते हैं। वृक्ष में बदलते यक्ष या पत्थर में बदलते पाँडवों के मिथक इसी तरह के उदाहरण हैं।  संभवतः शाप तथा उःशाप वह तकनीक है जो  रूप परिवर्तन की कांक्षा का मिथक निर्माण करती है। अतः संरचना के स्तर पर संस्कृत का महत्वपूर्ण साहित्य, मिथक के पुनर्निर्माण के लिए शाप तथा उःशाप का प्रयोग करता है। यानी यह कहा जा सकता है कि मूल में महाभारत की मिथक कथाओं में रूप परिवर्तन संस्कृत काल एवं मध्य काल में  श्राप की तकनीक काम में ली जाती है। नवजागरण काल में राजनीति रूप परिवर्तन का आधार बनती है, (ऐयारी प्रधान उपन्यास)  आधुनिक काल में ट्रेजेडी, तो उत्तर-आधुनिक काल में फार्स इसके लिए ज़िम्मेदार है।  टेक्नॉलॉजी और मिथक एक ऐसा नया क्षेत्र है जिस पर भविष्य में अधिक काम किया जा सकता है।
मिथक, साहित्य, स्वप्न तथा भाषा देश एवं काल के संदर्भ में किस तरह भिन्न हैं, संरचना की दृष्टि से इनमें क्या समानता है इस पर विचार करना महत्वपूर्ण होगा। मिथ का काल इतिहास-पूर्व का होता है, साहित्य का काल ऐतिहासिक तथा चैतसिक (मनोवैज्ञानिक) होता है,  स्वप्न का काल अचेतन में स्थित है तथा भाषा का काल प्राण में अवस्थित है। मिथक तथा कुछ अंश तक स्वप्न को छोड़ दें , तो भाषा और साहित्य का देश ऐतिहासिक है। मिथक का देश सांस्कृतिक तथा सामूहिक अचेतन है, वह कहीं अन्य घटित हुआ होता है; स्वप्न का देश व्यक्ति का अचेतन है। यूँ मिथ और स्वप्न अचेतन की सृष्टि है तथा साहित्य एवं भाषा चेतन की; इसीलिए जब भाषा में मिथकीय अभिव्यक्ति होती है तो वह चेतन तथा अचेतन के द्वन्द्व का परिणाम है। ( यहाँ इस बात की चर्चा नहीं की जा रही है कि भाषा भी एक मनोवैज्ञानिक पक्ष होता है) ऐतिहासिक देश काल में जब मिथक यात्रा करते हैं तो युगबोध निर्धारित करता है कि मिथक का स्वरूप क्या होगा। मिथक का संबंध जन्म मरण की घटनाओं के साथ होता है। मिथ अपने  निर्माण के बाद समय में बदलता है। जन्म-मरण, भय संत्रास आदि मिथक निर्माण के कारण हैं। पुत्र-प्राप्ति के प्रसंग में, नियोग दरम्यान भय से माता (अंबालिका) आँख बंद कर लेती है तो धृतराष्ट्र का जन्म होता है। महाभारत में वह एक अन्ध राजा के रूप में चित्रित है। महाभारत जब समय में आगे बढ़ता है तो यह शारीरिक अंधत्व प्रतीकात्मक हो जाता है, रवीन्द्रनाथ में गांधारी के निवेदन में पुत्र मोह का प्रतीक तथा भारती के अंधा-युग में सत्ता मोह का प्रतीक बन जाता है। भाषा और साहित्य का देश-काल एक ही है- ऐतिहासिक-भौगोलिक-चैतसिक । अतः जब साहित्य तथा भाषा में मिथक आता है तब ऐतिहासिक एवं अचेतन का संयोग होता है और एक सर्वथा नए अर्थ का उदय होता है। इस संदर्भ में द्रौपदी  का चरित्र महाभारत का बड़ा विलक्षण मिथ है। उस पर बहुत लिखा गया। नरेन्द्र शर्मा से लेकर महाश्वेता तक ने अपने तरीके से इस मिथक को व्याख्यायित किया है। जैसा कि पहले कहा जा चुका है कि मिथक कथा-रूप होते हैं, अतः उनकी अनंत व्याख्याएं संभव हैं। यही मिथक की सार्थकता भी है। उसमें अर्थ की अनंत संभवनाएं बनी हुई हैं। समाज, संस्कृति, राजनीति, विचारधारा --- सभी इनमें नए और अनुकूल अर्थ देखते हैं। पर अपने मूल रूप में मिथक बड़े कॉम्पैक्ट(संपुटित) होते हैं। द्रौपदी का जन्म अग्नि में हुआ तथा मृत्यु हिम में। जन्म ऊर्जा का तथा मृत्यु शीत का प्रतीक है। फिर दृश्यात्मक रूप से यह अत्यन्त सुंदर है। इसमें रंग का(केसरी तथा श्वेत) तथा स्पर्श (शीत तथा ताप का विपरीत सौन्दर्य भी है। द्रौपदी कितने सारे अर्थ देती है। ताप तथा शीत के बीच की उसकी जीवन-कथाएं कितने सारे संदर्भों एवं अर्थों से भरी हैं।
देह की उपस्थिति, जीवन की उपस्थिति का संकेत है। इसी तरह देह-विलय जीवन की अनुपस्थिति का संकेत है। अतः मिथक की रचना में देह की उपस्थिति/अनुपस्थिति का बड़ा मूल्य है। इसके आधार पर कई मिथक बने होंगे। ये मिथक या तो प्रतीकों के रूप में अथवा कथाओं के रूप में या फिर कथन-पद्धतियों में विभक्त हो कर विभिन्न रूप धारण करते हैं। दीये का जलना अथवा बुझना, मिट्टी के घड़े का फूटना अथवा फोड़ना --- इसी प्रसंग में एक मिथक की चर्चा की जा सकती है। मृत-प्रियजन के लौटने की कामना संभवतः मनुष्य की आदिम इच्छा रही होगी। तो मिथ है – मृतक का लौटना । सावित्री की कथा का मिथ इसी प्रकार का है। महाभारत इस मिथ की पहली अभिव्यक्ति कही जा सकती है। फिर महर्षि अरविंद सावित्री महाकाव्य की रचना करते हैं। फिर समय में मिथ आगे बढ़ता है। आधुनिक काल के मशाल-पुरुष मोहन राकेश सावित्री के मिथ का विरूपीकरण करते हैं।  भारतीय समाज में सावित्री सम्मान का प्रतीक है। वट-सावित्री का धार्मिक अनुष्ठान आज भी संपन्न होता है। कुंती, द्रौपदी, सावित्री सतियाँ है। महाभारत की सावित्री जिसका विशेषण 'सती', अब  संज्ञा हो चुका है, वह आधे अधूरे में एक विरूपित चरित्र के साथ दृष्टिगोचर होती है। वह अपने पति महेन्द्रनाथ से असंतुष्ट है। अतः उसका संबंध चार पुरुषों से दिखाया गया है। फिर भी वह द्विधा में है। 'आधे- अधूरे'  की सावित्री का पति आत्महत्या करना चाहता है। एकदम विपरीत गति। महाभारत की सावित्री अपने पति को मौत के मुँह से बचा लायी है, राकेश की सावित्री पति को मौत के मुँह में धकेलने के लिए तत्पर। ऐश्वर्य भोगने वाला इन्द्र राकेश में आ कर बनता है महेन्द्र पर है वह कंगाल एवं नपुंसक। चार पुरुषों से संबंध बनाने वाली सावित्री की खोज पूर्णता  की ही है।  इस नाटक में वह पूर्ण पुरुष की खोज कर रही है। पूर्णपुरुष तो केवल कृष्ण ही हैं। आधे अधूरे में काले सूट वाला आदमी – सूत्रधार है। कृष्ण काले और यह काले सूट वाला आदमी। एक गज़ब की समानता है। सतीत्व एवं पूर्ण पुरुषोत्तम का मिथ आधुनिक काल में आ कर इस हद तक विरूपित हो जाता है।
देश और काल मिथकों में नया अर्थ भरते हैं। देश और काल की ही कसौटी पर साहित्य तथा भाषा भी अर्थ पाते हैं। स्वप्न, मिथ, साहित्य तथा भाषा की संरचना में समानता है। स्वप्न के अर्थ स्वप्न के दृश्यों में छिपे हैं। मिथ के अर्थ उसके प्रतीकों एवं आकारों में समाहित हैं, साहित्य का अर्थ उसकी रचना और संभाव्यता में है, उसके अलंकारों और बिम्बों मे है और उच्चरित तथा लिखित ध्वनि एवं शब्द में उसके अर्थ छिपे हैं। यह जो प्रतीक तथा तात्पर्य का युग्म है, वह देश और काल में यात्रा करते हुए  मिथकीय अभिव्यंजना के नए अभिगम प्रस्तुत करते हैं।    


[i] गुजराती कवि प्रवीण पंड्या की कविता इस कौरव पाँडव के समय में से प्रेरित

[ii] प्रायः भाषा शिल्प शब्द प्रयोग साथ किया जाता है। पर इतना समझना आवश्यक है कि अगर ताना-बाना भाषा है तो पट शिल्प है;  मिट्टी अगर भाषा है तो मूर्ति शिल्प है, रंग अगर भाषा है तो चित्र शिल्प है-  अर्थात् मिथकीय अभिव्यंजना के नए अभिगम किस तरह रंग और चित्र-पट दोनो में है, मिट्टी और मूर्ति में दोनों में हैं। अर्थात् कथा-संदर्भ एवं भाषा। इनको अलग कर के समझना असंभव है। ताने-बाने के अभाव में  पट का निर्माण असंभव है, और पट के अभाव में रंग चित्र का निर्माण नहीं कर सकते। ताने-बाने की गति और विधि अलग अलग पोत निर्माण करते हैं। भाषा के विशिष्ट प्रयोग कृति के शिल्प का निर्माण करते हैं।
संदर्भ पुस्तकें
Alex Preminger. Encyclopedia of Poetry and Poetics. दि.न.
Northrope Frye. Fables of Identity. New York & London: A Harvest/HBJ Book, USA, 1963.
डॉ नगेन्द्र. मिथक और साहित्य. दिल्ली: नेश्नल पब्लिशिंग हाऊस, 1979.
डॉ.भोलाभाई पटेल. “पुराण कल्पनोनो साहित्य मां विनियोग.” भोलाभाई पटेल. पूर्वापर. मुंबई: . शेठ नी कंपनी, 1976.



रविवार, 11 मार्च 2012

अन्तर्राष्ट्रीय संगोष्ठी, इग्नू. दिल्ली में पढ़ा पर्चा--2,3,4 मार्च 2012

अनुवाद के आईने में विचारधारा एवं राजनीति के चेहरे

हम एक ऐसी दुनिया में रह रहे हैं जहाँ सब कुछ राजनैतिक अथवा विचारधारात्मक-सा लगता है। जीवन की सर्वाधिक सूक्ष्म संवेदनाओं से लेकर जीवन की कठोर वास्तविकताओं तक --- सब कुछ जैसे राजनैतिक अथवा विचारधारात्मक आवरण में लिपटा हुआ दिखाई पड़ता है। अगर हमारा लेखन (रचना) इस तरह का हो गया है तो क्या अनुवाद इससे कुछ भिन्न होगा। यह बात इस तरह लिखते-लिखते ही मुझे परम आचार्य देरिदा की शैली का स्मरण हो आया कि (कहीं) यह बात असल में, मैं, रोमान्टिक कवि पर्सी बिसी शैली की प्रसिद्ध कविता 'ओड टू दी वैस्ट विंड' की जानी-मानी पंक्ति 'If Winter comes, can spring be far behind- ' की तर्ज़ पर लिख रही हूँ, और यहाँ क्या मेरा उपरोक्त कथन उसका अनुवाद ? रूपांतर ? इस्तेमाल ? उल्लेख ? है। लेकिन मुझे यह कहना होगा कि मेरा यह कथन कि 'अगर लेखन इस तरह का हो गया है तो क्या अनुवाद इससे कुछ भिन्न होगा... 'दूर-दूर तक यह शैली के पंक्ति का अनुवाद नहीं है। न ही उसकी पैरोड़ी। मैं दरिदा की शैली में अपना लेख लिखने की अथवा , अब इस समय, इसकी विस्तृत व्याख्या करने की ज़ुर्रत भी नहीं करूंगी क्योंकि मैं इस रूप में न तो देरिदा की लेखन शैली का अनुकरण करना चाहती हूँ, न ही अनुवाद। न ही मेरी इतनी हैसियत है।

पर इसमें कोई संदेह नहीं कि देरिदा की बदौलत (ही) आज हम अनुवाद को लेकर इस तरह सोचने के लिए प्रवृत्त हुए हैं। अनुवाद पिछले कुछ एक दशकों से लेखन का सम-स्थानीय हो गया है। अनुवाद के संदर्भ में देरिदा ने अपने दो मशहूर लेखों- What is a 'Relevant' Translation तथा Living On Borderlines में कई नए मुद्दे उठाएं हैं। वाल्टर बेंजामिन की संकल्पना का आधार ले कर देरिदा ने अनुवाद को लेखन(रचना) का उत्तर-जीवन कहा है। कई सारे पेंच-कस तथा जटिलताओं के साथ जिस तरह प्रस्तुत किया है उसे मैंने यहाँ लगभग एक सपाट कथन में लिखा दिया है। अनुवाद विषयक देरिदा की इस नितांत भिन्न दृष्टि का अपना एक राजनैतिक संदर्भ भी था। साथ ही उनके अपने (निजि एवं नस्लगत) सांस्कृतिक तथा ऐतिहासिक अनुभव(अप्रिय) भी थे जिसके फलस्वरूप वे एक ही साथ अनुवाद को हिंसात्मक (एनिहिलेट) तथा पुनः जीवन (उत्तर-जीवन) दोनों ही मानते थे। यूं भी देरिदा एक ही साथ दो विरोधी अथवा विपरीत स्थितियों की सह-कल्पना के लिए जाने जाते हैं। जैसा कि वे कहते हैं कि 'ऐसा कुछ भी नहीं है जो अनूदित नहीं हो सकता और कुछ भी ऐसा नहीं है कि जो अनूदित हो सकता है'। (Derrida, 2001) अगर हमारा आज का संदर्भ देरिदा की संकल्पना को समझने के उपक्रम का होता तो अवश्य ही इस पर अधिक विचार किया जा सकता था पर जहाँ तक आज के हमारे विषय का प्रश्न है, मैं इतना अवश्य कहना चाहूँगी कि अपनी बात कहने के लिए ही मुझे देरिदा के कथनों की बीच-बीच में आवश्यकता पड़ सकती है। मसलन, हम देरिदा की निजि तथा नस्लीय अनुभूति वाली बात पर आएं तो मेरे मन में एक समानांतर रूपक यह जागता है कि जिस तरह एक अच्छी रचना पढ़ कर सहृदय को अपने अनुभवों का अनुरणन उसमें सुनाई पड़ता है, देरिदा की इन अनुभूतियों को पढ़ कर मेरे मन में भी एक भारतीय अनुभव का अनुरणन जागता है। देरिदा की अनुभूतियों के ठीक विपरीत भारतीय अनुभव को देखा जा सकता है। रचना के उत्तर – जीवन के कई उदाहरण राहुल सांकृत्यायन की अनुवाद-प्रवृत्ति में देखे जा सकते हैं। यह बात बहुत जानी-मानी है कि राहुल सांकृत्यायन ने उन अनेक ग्रंथों का चीनी से संस्कृत या हिन्दी में अनुवाद किए। अनुवाद का यह उत्तर-जीवन, पाली से चीनी में. चीनी से फिर संस्कृत/हिन्दी के अनुवाद- पथ पर से आ कर(यात्रा कर के- travel/travail) हमारे पास लौट आए हैं। 'लिविंग ऑन बॉर्डर लाईंन्स' में शुद्धतावादियों पर तन्ज़ कसते हैं देरिदा। अगर भारत में भी हम शुद्धतावादी नज़रिया अपनाएं तो यह बहुत मुश्किल हो सकता है। जिस तरह अपहृत तथा बलात्कृत कन्या को प्रायःहमारे समाज में स्वागत- योग्य नहीं समझा जाता , उसी तरह यह इतनी लंबी भाषायी-यात्रा कर के आई किसी कृति के विषय में भी हम क्या यही समझ रखेंगे? भारत की अपनी सांस्कृतिक स्थितियां पश्चिम से इतनी भिन्न रही हैं कि हमारे लिए यही एक बड़े आनंद का तथा तसल्ली का विषय हो जाता है कि 'चलो इस बहाने वह प्राचीन ज्ञान तो सुरक्षित है'। हमें अपनी धरोहर तथा लुप्त ज्ञान की पुनः प्राप्ति का आनंद अधिक रहा है। यूं भी अशुचि स्थानों पर पड़ी स्वर्ण मुद्राओं ( इसी के आधार पर संपत्ति-प्रतीक) को शुद्ध करके लिये जाने में किसी को भी परहेज़ नहीं हो सकता है, ऐसा मानने वाली मानव प्रजा हैं हम। (हम यानी केवल भारतीय नहीं , बल्कि , समग्र मनुष्य जाति?) उसी तरह यह भी सच है कि इतिहास में क्रमशः भाषा और मनुष्य तभी विकसित हो सके हैं, बचे भी रह सके हैं ,जब वे शुद्धता के प्रति आत्म-दाह की सीमा तक आग्रही नहीं रहे हैं। ग्रंथ अनूदित हुए हैं, उन्हें पुनर्जीवन मिला है। टीकाएं तथा व्याख्याएं भी अगर अनुवाद का ही एक रूप हैं तो निश्चय ही भारतीय प्राचीन ज्ञान का एक बहुत बड़ा हिस्सा इसी कारण सुरक्षित रहा है। । इसमें एक बात को ध्यान रखें कि हमारे यहाँ मृत्यू तथा जीवन दोनों ही प्रसंगों के साथ ही एक तरह की अशुचिता जुड़ी हुई है। यानी देरिदा का ही विरोधाभास उधार लें तो मांगलिक और अमांगलिक दोनों ही प्रसंगों के साथ अशुचिता जुड़ी हुई है। लेकिन दोनों ही अनिवार्य तथा इच्छनीय हैं। हमारे यहाँ की भाषाई संस्कृति की परंपरा तो शुद्धता के तमाम आग्रहों के मुँह पर एक तमाचा है।

दूसरी बात यह है कि हमारे यहाँ भाषाओं की सहोपस्थिति साहित्य की रचनात्मकता का ही एक हिस्सा रहा है। चाहे खुसरो हो या रसख़ान – एक ही कविता की दो पंक्तियों में दो विभिन्न भाषाओं का इस्तेमाल करने का रुझान उनमें देखा जा सकता है। इसे उस संस्कृत परंपरा के साथ जोड़ कर देखा जा सकता है जहाँ संस्कृत के साथ प्रकृतों का प्रयोग कृति की बनावट का हिस्सा रहते थे। इसलिए संभवतः संस्कृतियों की सहोपस्थिति हमारे लिए जितनी सहज है उतनी ही सहज भाषाओं की सहोपस्थिति भी रही है। तभी संस्कृति-अध्ययन तथा एक जाति का संहार कर के (एनिहिलेट) उस पर अपना कब्ज़ा कर लेना हमारे अनुभव का वैसा हिस्सा कभी नहीं बने जैसा पश्चिमी देशों का अनुभव रहा है।(महाभारत में भी वंश को एनिहिलेट करनी की बात है, जाति को नहीं)

पर फिर भी देरिदा के कारण ही पहली बार गोया, अनुवाद-दृष्टि प्रयोजनमूलकता एवं प्रचार की परंपरागत दृश्यात्मकता से आगे बढ़ कर एक स्वतंत्र अस्तित्व धारण कर चुकी है। सैद्धांतिक रूप से आज लेखन तथा अनुवाद दोनों ही समानता की भूमि पर स्थित नज़र आते हैं। इसका अर्थ यह हुआ कि अब साहित्य की भाँति अनुवाद का एक स्वतंत्र अस्तित्व है। ठीक उसी तरह जैसे किसी समय तुलनात्मक साहित्य सामान्य साहित्य के अधीन, उसका एक हिस्सा था, पर कालांतर में अलग हो गया और अनुवाद जो तुलनात्मक साहित्य तथा सामान्य साहित्य के अधीन माना जाता था वह अब स्वतंत्र हो गया। किसी के भी अधीनत्व से निकल कर अपनी स्वतंत्र इयत्ता का साथ आज अनुवाद खड़ा है। तभी उसकी विचारधारा और उसकी राजनीति पर चर्चा प्रासंगिक हो जाती है।

यानीकि जिस तरह साहित्य की अपनी एक राजनीति है क्या उसी तरह अनुवाद की भी अपनी एक राजनीति है ?!? अनुवाद की राजनीति तथा साहित्य की राजनीति क्या अलग है? या उनमें कोई समानता है? इस बात को पड़तालना रोचक हो सकता है कि व्यापक स्तर पर अनुवाद के वास्तविक कार्य तथा अनुवाद अध्ययन क्या किसी तरह के विचारधात्मक झुकाव से प्रभावित होते हैं अथवा नहीं। इक्कीसवीं सदी में साहित्य को देखने का नज़रिया बदल गया है। अनुवाद बाजारोन्मुखी हो गए हैं और विचारधारा का स्थान विमर्शों ने ले लिया है। फिर विमर्श भी विभिन्न विचारधारात्मक चौखुंटों में बँट गए हैं। हमारे पास मार्क्सवादी नारी है, गाँधीवादी नारी है, राष्ट्रवादी नारी है उसी तरह विभिन्न प्रकार के दलित और आदिवासी भी हैं। अर्थात् साहित्य के द्वारा इन प्रकारों को हम देखते पहचानते हैं, परन्तु इनके बाहर भी निरे स्त्री-पुरुष रहते हैं, जो शायद ही साहित्य में प्रवेश पा सकते हैं। लेखक के घोल में घुल कर मनुष्य निरा मनुष्य कहाँ रह पाता है। 'गोदान' का होरी और गोदान के बाहर का 'होरी' एक ही नहीं है। वह भिन्न हैं। असल में यह प्रश्न सर्जनात्मक विश्व का भी है। वास्तविक विश्व जब सर्जनात्मकता के क्षेत्र में प्रवेश करता है, तब वह बदल जाता है। वह वास्तविक विश्व नहीं रहता। तभी हम देखते हैं कि महाश्वेता देवी के आदिवासियों, ध्रुव भट्ट तथा मनुभाई पंचोली 'दर्शक' के आदिवासियों में अंतर है। इन आदिवासियों को उन लेखकों ने जिस तरह देखा है, वे वैसे हैं। 'दर्शक' के उपन्यास 'कुरुक्षेत्र' (हिन्दी अनुवाद- वाणी प्रकाशन, दिल्ली) के आदिवासी स्वार्थी, हिंसक तथा अज्ञानी हैं। उन्हें अपना हित समझ में नहीं आता। सत्ता द्वारा, सत्ता के स्वार्थ द्वारा प्रेरित विकास करते हैं और सत्ता के पक्ष में निर्णय बदलने वाले इन आदिवासियों का तभी महत्व है जब वे सत्ता को अनुकूल रहें। तत्वमसि(राजकमल प्रकाशन, दिल्ली) में ध्रुव भट्ट के आदिवासी अस्मिता से भरे , जुझारू, अपनी परंपराओं पर गर्व करने वाले हैं, जिनका अंत में भला तभी हो सकता है, अगर वे व्यापक भरातीय परंपरा का अनुसरण करते हुए, अपने को उसका हिस्सा मानते हुए , अपनी अस्मिता पर गर्व करें। जबकि महाश्वेता का आदिवासी(चोट्टीमुंडा और उसका तीर, जंगल के दावेदार, राधाकृष्ण प्रकाशन नयी दिल्ली)) अपने पाँवो पर ,अपनी ज़मीन पर खड़ा, सत्ता को चुनौति देता है। यानी जो आदिवासी सर्वाधिक अनूदित हो रहा है वह तो तीसरा आदिवासी है। जो अधिकरों के लिए लड़ता है। जो राजनैतिक सत्ता अथवा परंपरा की सत्ता को स्वीकार नहीं करता, जो अपने जंगलों पर अपनी दावेदारी अपने बलबूते पर करता है। जो तुलना में सर्वाधिक लोकतांत्रिक है। उत्तर-आधुनिक दौर में जब यह आदिवासी विमर्श हो रहा है तब इस बात को ध्यान में लेना होगा कि महाश्वेता का आदिवासी 1980 के पहले का है जो( मार्क्सवादी) विचारधारा का पक्व समय था और दर्शक तथा ध्रुवभट्ट का आदिवासी (क्रमशः 1991 तथा 2001) विमर्श के दौर का । अर्थात् वह कन्स्ट्रकटेड है। विमर्शों के फलस्वरूप अपनी विचारधारा अथवा सत्ता की विचारधारा के अनुरूप 'डिजाईंड' है। अपनी मूल प्रकृति के अनुसार , जब तक सत्ता नहीं बन जाता, मार्क्सवादी विचार, हमेशा ही प्रतिरोध की विचारधारा रही है। अतः वह सत्ता की विचारधारा नहीं है। तभी महाश्वेता के आदिवासी इन बाद के आदिवासियों से अधिक सच्चे लगते हैं।

पर यह कहना सचमुच बहुत कठिन है कि वास्तविक आदिवासी किस तरह होंगे? किस की तरह होंगे? सवाल इतना ही है कि हमारी वर्तमान राजनीति किस तरह के आदिवासियों को महत्वपूर्ण मानती है । क्या उसी तरह के आदिवासी अनूदित होकर दूसरी भाषा में जाते हैं? यह हमारे सामने बहुत स्पष्ट है कि सबसे अधिक बिकने वाले आदिवासी महाश्वेता के हैं। क्या इसका एक कारण यह है कि ये आदिवासी विमर्शों के दौर के पहले के हैं ? अतः चाहे चोट्टी के तीर पर रहने वाले मुंडा आदिवासी हों या जंगल के दावेदार हों, जितनी उनकी चर्चा हुई है, उतनी चर्चा उन स्रोत भाषा-पाठों के बाहर न तो ध्रुव भट्ट के नर्मदा तीर पर रहने वाले साठसाली आदिवासियों की हुई, न ही दर्शक के महाभारत कालीन नाग आदिवासियों की। अगर सर्जनात्मक प्रक्रिया की बात करें तो ध्रुव भट्ट ने भी महाश्वेता की ही तरह क्षेत्र पर जा कर ही , आदिवासियों के बीच रहकर ही, यह उपन्यास लिखा है। बाद में भी वे उस क्षेत्र में जा कर काम करते रहे हैं। पर संघर्ष और अस्मिता का जो आदर्श महाश्वेता के आदिवासियों में, व्यवस्था से लड़ते हुए हम देखते हैं वह ध्रुव भट्ट में उस तरह नहीं है। वहाँ व्यवस्था ( मारवाड़ी) या सरकार उतनी बुरी नहीं है, बल्कि वह आदिवासियों की मदद करती दिखाई पड़ती है। विरोध की हिंसा वहाँ नहीं है अतः हमें संभवतः उतना आकृष्ट नहीं करती, अथवा जकड़ती नहीं है। वहाँ फोकस संभवतः विदेश में रह रहे भारतीय नायक के भीतर सोयी हुई भारतीयता की रक्षा करने का उपक्रम भी है। फिर प्रगतिशील विचारधारा का कालगत तथा भौगोलिक व्याप भी बड़ा है। सो अनूदित होते हैं प्रगतिशील आदिवासी। यों भी दक्षिणपंथी विचारधारा तो हमेशा ही संदेह के दायरे में रही है। अतः अनुवाद कैसा हुआ है, यह बात इस मुद्दे पर निर्भर है कि अनुवाद किस चीज़ का हुआ है। अनुवाद की गुणात्मकता इस बात पर तय नहीं की जाती कि वह मूल से कितना वफ़ादार है, इत्यादि। अथवा वह 'रेलेवेंट' है या नहीं। बल्कि, कौन-सी विचारधारा उसे रैलेवेंट बनाएगी, इस बात पर ध्यान दिया जाता है। आज की हमारी गणतांत्रिक लोकतांत्रिक राज्य-व्यवस्था किसी भी रूप में धार्मिक अथवा दक्षिणपंथी विचारधारा को बढ़ावा नहीं देती। यहाँ मैं इस संदर्भ में ध्रुव भट्ट के' तत्वमसि 'का इसलिए भी उल्लेख करना चाहती हूँ क्यों उसके अनुवादक की हैसियत से इस कृति का अनुवाद करने की प्रक्रिया से गुज़रते हुए, अनुवाद कर लेने के बाद तथा पुस्तक के प्रकाशित होने के बाद के अपने अनुभवों का आकलन जब करती हूँ तो मुझे यह साफ़ दिखलाई पड़ता है कि अगर अनुवादक के रूप में मैंने पुस्तक के आरंभ में कृति के हिन्दुवादी झुकाव संबंधी मंतव्य नहीं दिए होते अथवा निर्मल वर्मा के 'अंतिम अरण्य' के साथ उसकी तुलना न की होती तो संभवतः कृति को अधिक पाठक मिलते। एक अनुवादक के रूप में मेरे लिए महत्वपूर्ण यह बात थी कि अनुवाद ऐसा हो कि मूल का स्वाद दे। मुझे इस बात की प्रसन्नता भी है कि अनुवाद को पढ़ने पर स्वयं लेखक का कहना यह था कि ऐसे लगता है जैसे मैंने यह कृति हिन्दी में लिखी है। अथवा विभिन्न कार्य क्षेत्रों से जुड़े कुछ लोगों के मंतव्य को ध्यान में लूं तो उन्हें यह कभी नहीं लगा कि वे एक अनूदित कृति को पढ़ रहे हैं। पर उसकी पाठकीय स्थिति से यह स्पष्ट होता है कि राजनीतिक विचारधारा का बल अनुवाद के रेलेवेंट होने में अधिक काम करता है। तब मैं अनुवाद और राजनीति तथा विचारधारा के पारस्परिक मुद्दों के संदर्भ में 'इनोसेंट' थी तथा अनुवाद की गुणात्मकता के पक्ष में विचारधारा तथा राजनीति की हिंसा से भिड़ लेने की तैयारी रखती थी। तब मुझे इस बात का पूरा अंदाज़ा नहीं था कि बाज़ार भी विचारधाराओं में आ चुके हैं और विचारधाराएं बाज़ारोन्मुखी हो गयी हैं। प्रकाशन संस्थाएं साहित्य की गुणवत्ता से अधिक विचारधाराओं के बाज़ार तथा बाज़ार में खड़ी विचारधाराओं को अधिक महत्वपूर्ण मानती हैं। ख़ैर। शायद तब अनुभव के स्तर पर पहली बार अनुवाद के आईने में मैंने विचारधाराओं एवं राजनीति के चेहरे दिखाई पड़े थे।

रचना की तरह ही अनुवाद भी अपनी एक सामाजिकता रखते हैं। मसलन आपने महाश्वेता को नहीं पढ़ा है तो आप साहित्यिक सामाजिकता में पिछड़े माने जा सकते हैं। हम जो अन्य भाषा-भाषी हैं, किसी भी कृति को उसके अनुवाद में ही पढ़कर जानते हैं। महाश्वेता के उपन्यास को हम उसकी विचारधारा के कारण ही अनुवाद में भी उत्तम मानते हैं। क्योंकि अनुवाद में तो कृति के सौन्दर्य पक्ष की चिंता हमें करनी ही नहीं होती, क्योंकि उसे पढ़ने की शुरुआत में ही हम जानते हैं कि अनुवाद में मूल का एक बड़ा हिस्सा नष्ट हो जाता है। अतः अनुवाद में उत्तम सर्जनात्मक / सौन्दर्यात्मक मूल्य वाली कृति का महत्व उतना नहीं है जितना प्रचलित तथा प्रतिष्ठित विचारधारा का रहता है। यह अनुवाद की राजनीति है। अपनी काव्यातमकता में तथा गुजराती साहित्य के इतिहास में राजेन्द्र शाह कितने भी बड़े कवि क्यों न हो, ज्ञानपीठ विवाद के बाद, गुजरात के बाहर अब इस बात को स्वीकार करना कि आप उन्हें महत्वपूर्ण मानते हैं, अपने आप को अस्पृश्य कर लेने के बराबर है।

यहाँ अनुवाद की एक और राजनीति काम करती है, जो बड़ी सूक्ष्म किन्तु ख़तरनाक़ भी है। । अगर राजेन्द्र शाह के प्रति फैले इस तिरस्कार या घृणाभाव को हमें बढ़ाना हो तो हम उनके बदतर अनुवाद कर के उस राजनीति को पुष्ट कर सकते हैं। इतना ही नहीं, कविताओं के चुनाव से ले कर अनुवाद की गुणात्मकता तक इस राजनीति को फैलाया जा सकता है। अतः यह कहा जा सकता है कि मूल लेखन में जहाँ केवल विचारधारा ही प्रश्न के घेरे में है वहाँ अनुवाद में यह बढ़कर वर्तमान राजनीतिक सरोकारों एवं बाज़ार तक तक फैल जाती है। राजेन्द्र शाह के अनुवाद इसके उदाहरण हैं। यहाँ फिर महर्षि देरिदा को याद किया जा सकता है। आप पाठ को किस तरह पढ़ते हैं और पाठ के किस अंश को अपनी समझ का आधार बनाते हैं- सहत्वपूर्ण यह है। (सूरदास के) ऊधो की खेप (ज्ञान) को बाजार के परिप्रेक्ष्य में समझें अथवा धर्म के परिप्रेक्ष्य में- यही तय करता है उसके अनूदित होने को, उसके पाठ को। उसी तरह 'ईदगाह' में बाज़ार के नकार को देखना अथवा पारिवारिक संवेदनाओं की सघन व्यापकता को ही देखना है, यह बात तय करेगी कि आप आज उसका अनुवाद करना चाहते हैं अथवा नहीं। पाठ को देखने का आपका तरीक़ा क्या है। गुजराती की पहली कहानी(?)- शांतिदास(1900, लेखक अंबालाल साकरलाल देसाई) जिसे गुजराती कहानी के विकास में पहली केवल उल्लेख भर के लिए माना गया है, वह आज के बाज़ारवाद के विरुद्ध भी एक ज़बरदस्त टिप्पणी के रूप में पढ़ी जा सकती है। पर आज तक किसी भी गुजराती समीक्षक ने उसे इस तरह देख कर इस बात की भूमिका नहीं बनाई कि उसका गुजराती से हिन्दी में अनुवाद करने का उपक्रम हो। उत्तर गुजरात के छोटे से गाँव का एक युवक मुंबई पढ़ने जाता है और वहाँ से किस तरह विदेसी(मुंबई तब विदेश ही था, गाँव वालों के लिए) जूते लाता है और धीरे धीरे गाँव के जूते बनाने वालों का व्यवसाय संकट में पड़ता है, सामाजिक संबंध खतरे में पड़ते हैं, पर गाँव वाले मिल कर उसका प्रतिरोध करते हैं------ तब उसमें लेखक स्वदेशी की बात करना चाहते थे और आज उसमें बाज़ारवाद का पाठ भी झलकता है। पर चूंकि, वह कहानी- कला की दृष्टि से कमज़ोर है अतः उसको आरंभिक कहानी का नमूना मान कर भुला दिया गया है। स्वयं लेखक उसे 'लेख' कहता है। खैर । कहने का मतलब यह है कि गुजरात की अपनी विचारधाराओं के कारण एक अच्छी रचना अभी बंद पड़ी हुई है। सवाल यह है कि हम अपनी पहचान किस तरह स्थापित करना चाहते हैं। यह एक राज्य की अपनी राजनीति का एक हिस्सा है। अथवा तो किस की राजनैतिक पहचान स्थापित करने का उपक्रम किया जाना है , यह भी तो इस राजनीति का हिस्सा हो सकता है ! यहाँ यह उल्लेख काम का हो सकता है कि —गांधीजी भारतीय राजनीति में 1900 में नहीं थे। स्वदेशी की संकल्पना गांधीजी के पहले इतने प्रभावक रूप से प्रकट हो चुकी थी, यह तथ्य गांधीजी द्वारा स्वदेशी आंदोलन की बात को क्या कमजोर करती है ? क्या यह अनुवाद की गांधीवादी राजनीति का एक हिस्सा है ?

अनुवाद की राजनीति , सत्ता की राजनीति है। अनुवाद को 'नॉलेज इटसेल्फ' कहना भी एक तरह की राजनीति है, जिसे राजनीतिक सत्ता अपनी तरह से इस्तेमाल करना चाहती है। फिर अनुवाद को राजनीति अपने मतलब के लिए साहित्य की तुलना में अधिक बेहतरी से इसलिए इस्तेमाल कर सकती है क्योंकि अनुवाद को वह अब भी इस्तेमाल करने की चीज़ मानती है। क्योंकि अनुवाद ' अनाथ' है- अगर उसे हम लेखन का उत्तर-जीवन मान लें। वह केन्द्र में नहीं है, परिधि पर है। उसे जब चाहे केन्द्र से परिधि और पुनः केन्द्र में लाया जा सकता है। फिर अनुवाद का वैसा कोई रचनात्मक कॉपीराईट नहीं है- कि एक कृति के लिए एक अनुवाद। एक ही कृति के कई अनुवाद होते रहे हैं और होते रहेंगे। पौधा एक है पर उस पर अनेक फूल लग सकते हैं। कौन-से पाठ अनूदित होंगे, किन अनुवादों को सम्मानित स्वीकृति मिलेगी किन को कभी नहीं, यह सत्ता की राजनीति तथा विचारधारा ने अपना विशेषाधिकार मान लिया है।

अपनी स्वतंत्र इयत्ता के साथ खड़े अनुवाद को देरिदा तक आते आते अगर स्पेस मिला है तो उसे इस स्पेस में जीवित रहने के लिए रचना से अधिक संघर्ष करना होगा इसमें कोई संदेह नहीं।