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शनिवार, 13 मार्च 2010

हिला हिलबिला हिला क्या बिल... महिला

हिला कर रख दिया है महिला बिल ने सभी को। यही हमारे समाज
की लिटमस परीक्षा है। कौन कितने पानी में है महिलाओं की स्वतंत्रता
और अधिकारों के प्रति यह अब खुलने लगा है। मैं तो कहती हूँ हो
जाये हिसाब किताब। अगर हमारे धर्माचार्यों को( दोनों ) को कुबूल नहीं कि
महिला आरक्षण हो, तो मैं कहती हूँ धर्म और भगवान का भी बँटवारा
हो जाए। महिलाएं अब अपना अलग मंदिर बनाएँ। पुजारी भी वही हों,
इसमें पुरुषों को प्रवेश न हो। सारी देवियाँ महिलाओं के हिस्से।अब से
अंबा, दुर्गा, भवानी, ग्राम-देवियाँ, सरस्वती, गायत्री किसीको भी पूजने का
हक़ पुरुषों को न हो। विष्णु आप लें , लक्ष्मी हम ले लेते हैं। रिद्धि-
सिद्धि हमारी, गणेशजी आपके। राधा हमारी , कृष्ण आपके। पार्वती
तथा आधे शंकर हमारे आपके केवल आधे शंकर। महिलाएँ मरें तो
महिला पुजारी सब करें-विधि-विधान। इस संदर्भ में और भी बहुत कुछ
कहा जा सकता है। पर पहले इतना तय हो जाए--फिर आगे की बात।

मंगलवार, 16 फ़रवरी 2010

मोरनियां

मोरनियाँ

मोर के रंगों को धारण कर,
मोरनियां बन जाती हैं चोरनियां
चोरनियां...........दिल चोरनियां

कैसे हो जाती हैं

दिल-चोरनियां..........मोरनियां ?

– मटमैली एकदम सादी-सी मोरनियां
होती हैं साधारण

मैंने

पहले भी कहा था
सुंदर नहीं होती हैं मोरनियां
फिर भी ... किस क़दर दिल चोरनियां !

के रंगों में धीरे-धीरे
रिम-झिम, रिम-झिम सराबोर हो जाना – आद्यंत – सरापा
उनकी नीली-हरी गरदनों की लचक में
झूम-झूम झूमना


रिम-झिम, रिम-झिम ......टे हें ओ ..... टे हें ओ ......
यही तो है, मोर के रंगों को धारण करना !

मोर –पाखी आँखों में झिल-मिल....झिल-मिल...मिलना
झिप-झिप झिप-झिप......
चुप-चुप …… …… चुप-चुप


बनती है चोरनियां........ये मोरनियां
मयूर-रंग में पगी.......... ये मोरनियां .....